Wednesday, March 29, 2017



ज्योतिष और दान



दान ही बन जाता है वरदान

सभी धमों में दान की महिमा का वर्णन है। सुपात्र को दिया गया दान ही वरदान बन जाता है। समस्त प्राणियों ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में दान की महिमा को देखा है। फिर भी कुछ प्राणी अहंकार वश तथा यह उस महामाया की ही माया है। सभी जन उसके कारण ही मोहित होते हैं ।

 ज्योतिष और दान

वह महामाया ही साधुओं का कल्याण तथा दुर्जनों के नाश का कारण बनती है। इस संसार को महामाया ने ही मोह के जाल में फसाया हुआ है जिसके कारण काम, क्रोध और लोभ का जन्म होता है। इन्हीं चारों के कारण व्यक्ति पाता भी लाभ और मोह की मात्रा जीवन में कम है तो मानव सुखी है अन्यथा दुखी ये ही सुख और दुख का कारण हैं। अब हम बात करते हैं दान की । दान कया है ? उत्तर-दान देने की क्रिया है। आधुनिक सन्दर्भों में दान का अर्थ किसी जरूरतमंद को सहायता के रूप में कुछ देना है।

जिस वस्तु को हम दान करें यह मानकर करें कि इस पर अब हमारा कोई अधिकार नहीं है बल्कि उस व्यक्ति का अधिकार है जिसे हम वह वस्तु दान दे रहे हैं।

दान को प्रकार—
1. दान के तीन प्रकार हैंसात्विक, राजस और तामस । जो दान पवित्र स्थान में और उत्तम समय में था नि:स्वार्थ भावना से दिया जाये से सात्विक दान की श्रेणी में रखा या है। अपने ऊपर किये गये उपकार बदले अथवा किसी फल की Tकांक्षा से अथवा विवशता वश जो न दिया जाता है उसे राजस दान हा गया है। अपवित्र स्थान एवं नुचित समय में बिना सत्कार के, वज्ञतापूर्वक एवं अयोग्य व्यक्ति को जो दान दिया जाता है वह तामस दान हा गया है।

2. कायिक, वाचिक और मानसिक न भेदों से पुन: दान के तीन प्रकार हे गये हैं। संकल्पपूर्वक जो सुवर्ण (स्वर्ण), रजत आदि दान दिया जाता है कायिक दान है अपने निकट कसी भयभीत व्यक्ति (शरणार्थी) के आने पर जो अभय दान दिया जाता है उसे वाचिक दान कहा गया है। जप और ध्यान प्रवृत्ति का जो अर्पण कहा गया है उसे मानसिक दान कहते हैं।

क्या देने से क्या बढ़ता है-
दान करने से धन बढ़ता है यह सत्य है लेकिन किस रूप में मिलता है, इसका वर्णन निम्नलिखित है :
दान फल (बढ़ता है/मिलता है) विद्या दान- विद्या बढ़ती है।
अन्न दान- अन्न भंडार बढ़ता है।
स्वर्ण दान- सुख बढ़ता है, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
रजत दान- मानसिक शांति प्राप्त होती है।
भू-दान- भूमि सुख प्राप्त होता है।
वृक्षदान- भौतिक सुख प्राप्त होते हैं, दोषों का शमन होता है।
" कन्या दान- ऋणों से मुक्ति, मन की शांति प्राप्त होती है।
लौह दान- कष्टों का अंत कायाँ में आ रही बाधा दूर होती है।
वस्त्र दान- शारीरिक सुखों में वृद्धि ।
औषधि दान- रोगों से मुक्ति ।
दीप दान- कृपा की प्राप्ति होती है।
धूपदान-आनन्द की प्राप्ति होती है।
तेलदान- कष्टों का अंत होता है।
जलदान- सुखों में वृद्धि व मानसिक शांति प्राप्त होती है।
रक्तदान- ग्रहदोष शांति होती है।
गोदान- मोक्ष की प्राप्ति होती है।
दानपात्र- सुपात्र को ही दान देने पर फलों की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं कि सुपात्र कौन है?
तपस्वी, वेद और शास्त्रों को जानने वाला और शास्त्र में बताए गये मार्ग का आचरण करने वाला . व्यक्ति दान का उत्तम पात्र है।

यहां गुरू का प्रथम स्थान है। इसके अनंतर विद्या, गुण एवं वय के, अनुपात से पात्रता मानी जाती है। भागिनेय भी दान के उत्तम पात्र हैं।

ब्राह्मण को दिया गया दान छः गुना, एवं शूद्र को जो दान दिया जाता है वह है। उपर्युक्त पात्रता का परिगणन विशेष दान के निमित्त किया गया है। इसके सिवाय यदि अन्नाः ओोर वस्त्र दानं देना हो तो उसके लिए उपर्युक्त पात्रता कही गई है।

दातव्य द्रव्य की मेद-
ये तीन प्रकार के होते हैं-शुक्ल, मिश्रित और कृष्ण | शास्त्र, तप, पराक्रम, योग, परम्परा ओर शिष्य से प्राप्त द्रव्य शुक्ल कहलाया। कुसीद, किसान और वाणिज्य से समागत द्रव्य मिश्रित बतलाया गया है। सेवा, यूत और चौर्य से प्राप्त द्रव्य को कृष्ण कहा गया है।

शुक्ल द्रव्य के दान से सुख प्राप्ति, मिश्रित द्रव्य के दान से सुख और दुख दोनों की प्राप्ति होती है। कृष्ण द्रव्य का दान देने से केवल दुःख ही मिलता है। द्रव्य की तीन परिस्थितियां देखी जाती हैं- दान, भोग और नाश जो करता उसका धन नाश को प्राप्त होता है। वह नाश बीमारी दुख या क्लेश, चिंता, अभाव आदि के रूप में प्राप्त होता है।

उत्तम कोटि का व्यक्ति अर्थात् सज्जन अपने द्रव्य का उपयोग दान के रूप में करता है। मध्यम पुरूष अपने द्रव्य का व्यय उपभोग में करते हैं। इससे अतिरिक्त व्यक्ति अपने द्रव्य का उपयोग न दान में ही करता है न उपभोग में अन्तत: द्रव्य नाश को प्राप्त होता है। इस प्रकार का व्यक्ति अधम कोटि में गिना जाता है।

शुद्ध और पवित्र मन से किया गया दान ही श्रेष्ठ फलों को देने वाला होता है। संकलिपत होकर नि:स्वार्थ भाव से बिना किसी उपकार की भावना के जो दान किया जाता है वही फलीभूत होता है अन्यथा फल प्राप्ति में सन्देह है। स्वयं उपयोग की हुई वस्तु (द्रव्य) का दान न करें सदैव नवीन वस्तु का दान संकलिपत होकर नि:स्वार्थ भाव से करें दान के द्वारा आप अपने जीवन में सभी सुखों को प्राप्त कर सकते हैं, यह एक , अनुभूत प्रयोग है।

दान ही इस कलियुग में वरदान का रूप है। कुछ खोकर ही कुछ पाया जा सकता है यही परम् सत्य है।

नितिन कुमार पामिस्ट



समृद्धि के लिए श्वर्ताक गणपति



पारिवारिक सुख शांति तथा संतान की समृद्धि के लिए श्वर्ताक गणपति
स्वेतार्क गणपति के रूप में साक्षात् भगवान् गणेश को अपने घर में स्थापित करें -

महर्षि अगस्त्य के अनुसार जीवन के सभी विध्नों को दूर कर सुमार्ग दिखाने वाले श्री गणेश जी की पूजा में श्वेतार्क की जड़ सबसे श्रेष्ठ सामग्री है। श्वेतार्क का अर्थ है सफेद रंग के आक का पौधा। यह बहुत ही दुर्लभ पौधा है तथा किसी भाग्यवान व्यक्ति को ही दिखाई देता है।

श्वर्ताक गणपति

इसके तने व जड़ के मजबूत भाग को काटकर गणेश जी की सुन्दर मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। श्वेतार्क से बनी यह मूर्ति स्वयं सिद्ध होती है जिस कारण इसकी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। इसे लकड़ी की चौकी पर लाल रंग के कपड़े का आसन बिछाकर उस पर स्थापित कर दे तथा इसकी चन्दन, हल्दी, चावल, सिन्दूर, धूप-दीप आदि के द्वारा पूजा करें। एक माला 'ऊँ ग गणपतये नम:' मंत्र का प्रतिदिन पाठ करें। जिस घर में श्वेतार्क गणपति की नित्य पूजा होती है, वहां कभी धन तथा खाद्यान्न का अभाव नहीं होता। वहां लक्ष्मी का हमेशा वास होता है। संतान प्राप्ति तथा संतान की सुखशान्ति के लिए भी श्वेतार्क गणपति की पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है। यदि आप व्यावसायिक रूप से अस्थिर हैं, नौकरी में मित्र प्रतिद्वन्द्वी, शत्रु या उच्च अधिकारी आपको परेशान करते हैं अपने व्यवसाय में आपको वांछित सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही है अथवा आप अन्य व्यक्तियों को हानि पहुंचाए बिना अपने प्रति उनका आकर्षण चाहते हैं तो श्वेतार्क गणपति मूर्ति को अपने पूजा स्थान में स्थापित करके प्रतिदिन इस मंत्र का एक माला पाठ करें : ‘ऊँ ग गणपतये वर वरद सर्वजनै मे वश मानय स्वाहा।' श्वेतार्क गणपति की कृपा से आपको मंत्र का प्रभाव साक्षात दिखाई देने लगेगा।

नितिन कुमार पामिस्ट



धैर्यबल योग जन्मकुंडली



कुंडली में धैर्यबल योग

1. कुण्डली में राहु मेष और मंगल वृष अथवा मिथुन राशि में स्थित हो तो धेर्य बल योग होता हे | शुक्र और बुध की दशाओं में मंगल की अंतर्दशा करे समय व्यक्ति मान्य वर बनता है | जिस ग्रह की दशा ही व्यक्ति उसका रत्न धारण करे और आराधना करे।

धैर्यबल योग जन्मकुंडली

2. कुण्डली में राहु वृष और बृहस्पति मिथुन अथवा कर्क राशि में हो तो धैर्य बल योग बनता है । बुध तथा चन्द्रमा की दशाओं में बृहस्पति की अंतर्दशा के समय व्यक्ति का वर्चस्व प्रकट होता है। बुध या चन्द्र जिसकी दशा हो उसका रत्न पहनना चाहिए ।

3. कुण्डली में राहु मिथुन और शनि कक अथवा सिंह राशि का हो तो धेर्य बल प्राप्त होता है । कक व सिंह राशिअी पर शनि का गोचर सुखकर होता है। चन्द्र और सूर्य की दशाओं में शनि की
अंतर्दशा करे समय व्यक्ति प्रियवर बनता है। जिस ग्रह की दशा हो उसका रत्न व्यक्ति धारण करे । उसकी आराधना करते हुए सर्वसुख की कामना करे।

4 कुण्डली में राहु कक और शनि सिंह अथवा कन्या राशि में स्थित हो तो धैर्य बल योग होता है। सिंह तथा कन्या राशियों पर शनि का गोचर शुभता देता है। सूर्य और बुध की दशाओं में शनेि की अंतर्दशा क समय व्यक्ति प्रसिद्धि पाता है। जिस ग्रहदेव की दशा हो उसका रत्न पहनना श्रेयष्कर होता है । ग्रह देव की आराधना करते सुख मांगे ।

5 कुण्डली में राहु सिंह राशि और बृहस्पति कन्या अथवा .तुला। राशि में स्थित हो तो धैर्य बल योग होता है। कन्या व तुला राशिओं पर बृहस्पति का गोचर शुभ फल प्रदान करता है। बुध तथा शुक्र की दशाओं में बृहस्पति की अंतर्दशा व्यक्ति को सौख्य देती हे |

6. कुण्डली में राहु कन्या राशि का और मंगल तुला अथवा वृश्चिक राशि का हो तो धैर्य बल योग बनता है। शुक्र और मंमल की दशाअी में मंगल की अतदशा के समय व्यक्ति लोकप्रियता पाता है | जिस ग्रह की दशा हो उसका त्नि पहने और ग्रह देव की भाराधना करे ।

7. कुण्डली में राहु तुला शशि और शुक्र वृश्चिक या धनु राशि में हो तो धैर्यबल योग होता है। मंगल और बृहस्पति की दशाओं में शुक्र की अंतर्दशा के तमय व्यक्ति मान्यवर होता है। जिस ग्रह की दशा ही व्यक्ति उसका रत्न धारण करें और सर्वसुख की कामना करे।

8. कुण्डली में राहु वृश्चिक राशि का और बुध धनु अथवा मकर राशि में स्थित हो तो धैर्य बल योग बनता है। बृहस्पति और शनि की दशाओं में बुध की अंतर्दशा के समय व्यक्ति सर्वमान्य होता है | व्यक्ति को बृहस्पति और शनि महाराज की आराधना को समय सुख समृद्धि को लिए कामना करनी चाहिए।

9. कुण्डली में राहु धनु राशि पर और चन्द्रमा मकर अथवा कुभ राशि में स्थित हो तो धैर्य बल योग होता है । शनि की दशा में चन्द्र की अंत दशा के समय व्यक्ति सामथ्र्य प्राप्त करता है ।

10. कुण्डली में राहु मकर राशि तथा सूर्य कुभ अथवा मीन राशि का हो तो धैर्य बल योग होता है। शनि और बृहस्पति की दशाओं में सूर्य की अंतर्दशा के समय व्यक्ति लोकप्रियता पाता है। शनि और बृहस्पति की आराधना करते सर्वसुख की कामना करनी चाहिए।


11. कुण्डली में राहु कुभ् राशि और बुध मीन या मेष राशि में स्थित हो तो धैर्य बल योग निष्पन्न होता है | बृहस्पति तथ मंगल की दशाओं में बुध क अंतर्दशा व्यक्ति के लिए वरदान होती है। बृहस्पति और मंगल जिस ग्रह देव की दशा ही उसक रत्न धारण करना एवं आराधन करना श्रेयष्कर होता है।

12. कुण्डली में राहु मीर राशि और शुक्र मेष राशि या वृt राशि में स्थित हो तो धैर्य बल योग स्थापित होता है । मंगल तथा शुक्र की दशाओं में व्यक्ति का वर्चस्व प्रकट होता है । मंगल या शुक्र देव जिसकी दशा उसका रत्न पहनना अराधना करना, सर्वसुख की कामना करन श्रेयष्कर होता है ।


नितिन कुमार पामिस्ट



कर्ज मुक्ति के लिए गणेश पूजा



ऋणमुक्ति गणेश साधना 

अपने अनेक पाठकों की मांग पर हम यहां ऋण मुक्ति गणेश साधना की विधि दे रहे हैं। ऋणनाशक विशेष प्रयोग को अन्तर्गत आपको ऋणमुक्ति कवच, हरिद्रा गणेश यंत्र व कुछ अन्य सामग्री की आवश्यकता होगी | 40 दिन के इस प्रयोग में आपको हरिदा गणेश यंत्र को पंचामृत से स्नान करवाना है। धूप, दीप, पान, सुपारी, लोंग व जायफल : चढ़ाना है। दूर्वा, लड्डू व सिन्दूर अर्पित करना है व मास मदिरा आदि व्यसनों का त्याग करना है।

कर्ज मुक्ति के लिए गणेश पूजा

शुक्ल पक्ष में बुधवार के दिन इस प्रयोग को आप आरम्भ करें। लाल रंग का आसन बिछाकर उस पर हरिद्रा गणेश यंत्र व ऋणमुक्ति कवच स्थापित करें। स्वयं भी लाल वस्त्र पहनें | यदि लाल वस्त्र न हों तो लाल अंग वस्त्र या अंगोच्छा ही धारण करें। शरीर पर एक लाल वस्त्र आवश्यक है। यंत्र को पंचामृत से स्नान करवाकर विधिवत स्थापित करें। धूप, दीप आदि के पश्चात विनियोग पढ़े, ध्यान मंत्र पढ़ें व ऋणनाशक मंत्र का 108 बार जप करें। पूजा के पश्चात गाय को हरा चारा दें। गणेश जी की मूर्ति पर दूर्वा चढ़ायें लड्डू का भोग लगायें | 40 दिन के प्रयोग के दौरान ही आपको सकारात्मक परिणाम मिलने लगेंगे । धनागम शुरू हो जायेगा तथा कर्ज चुकने लगेगा।

इस प्रयोग को आप निरन्तर तब तक जारी रखें जब तक आपका पूरा ऋण न उतर जाये | एक सप्ताह के पश्चात अगले बुधवार को आप पूजा के पश्चात ऋणमुक्ति कवच को धारण कर ले । यत्र का प्रयोग पहले की तरह जारी रखें । ऋणाहतां स्तोत्र का विनियोग व ध्यान मंत्र इस प्रकार हे : -

विनियोग-
अस्य श्री ऋणहटणकर्तृ गणपति स्तोत्र मंत्रस्य सदाशिव ऋषिः अनुष्टप् छन्दः श्रीऋणहरणकर्तुं गणपतिर्देवता ग्लौं बीजं शकिंत्तः गों कीलकतं मम् सकल ऋणनाशने विनियोग:।

ध्यान मंत्र-
ॐ सिन्दूरवर्ण दिभुजं गणेश लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम्। ब्रह्मादि देवैः पर्द्दित्सेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम्।

स्तोत्र -
सृष्टयादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूर्जितः फल सिद्धये । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाश करोति मे ॥
त्रिपुटस्यवधात् पूर्व शम्भुना सम्यगर्चितः । सदैव पार्वतीपुत्रः, ऋणनाश करोति में
हिंटण्यकशिंप्वादींना, वधाथf विष्णुनार्चितः। सदैव पार्वतीपुत्रः, ऋणनाश करोति मे
महिषस्य वधे देव्याः, गणनाथः प्रपूजितः । सदैव पार्वतीपुत्रः, ऋणनाशं करोति मे

नितिन कुमार पामिस्ट



नर भैरवी महायंत्र तथा लॉकेट



नर भैरवी महायंत्र तथा नर भैरवी लॉकेट

दांपत्य जीवन में असफलता संतान बाधा तथा व्यवसायिक रूकावटो को दूर करने के लिए एकमात्र लाभदायक उपाय -

नर भैरवी महायंत्र तथा लॉकेट

जन्मपत्री में अनिष्ट ग्रह स्थिति, दैवीय प्रकोप अथवा तंत्र बाधा के कारण प्रायः कुछ व्यक्तियों को अपने व्यवसाय व दाम्पत्य जीवन में असफलता अथवा अशांति का सामना करना पड़ता है। यदि परिस्थितियां अधिक विपरीत हों अथवा ग्रहों का दुश्प्रभाव अत्यधिक हो तो विशिष्ट उपायों के बिना सफलता मिलना असंभव होता है। जन्मपत्री में यदि सप्तम स्थान, सप्तमेश व कारक ग्रह शुक्र पीड़ित हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख नहीं मिल पाता।

पंचम स्थान व पंचमेश पीड़ित हो तो संतान बाधा होती है। इन परिस्थितियों में जातक को विवाह अथवा संतान प्राप्ति में निरन्तर देरी होती रहती है। यदि विवाह हो भी जाए तो आपसी मतभेदों के कारण व्यक्ति की मानसिक स्थिति निरन्तर अस्थिर रहती है। ऐसी परिस्थितियों में प्राय: व्यक्ति निराशा की भावना से पीड़ित होता है अथवा बदले की भावना से मन को कुंठित करता है। विवाह के पश्चात् तलाक लेने वाले व्यक्ति एक दूसरे पर धोखा देने या जानकारी छिपाने के आरोप लगाते हैं। उपाय के रूप में हीरा, पन्ना, मोती या पुखराज आदि रत्न धारण करने पर भी जातक को कोई लाभ नहीं मिलता।

इन सब समस्याओं का एकमात्र उपाय केवल नर भैरवी यंत्र ही है। यदि आप दाम्पत्य जीवन से संबंधित किसी भी समस्या का सामना कर रहे हैं जैसे-जीवन में प्रेम व आकर्षण का अभाव, प्रेम संबंधों में असफलता, विवाह न हो पाना या विवाह की इच्छा न होना, विवाह के बाद आपसी संबंधों में तनाव, विश्वास में कमी या पति अथवा पत्नी का सही मार्ग से भटकना, तलाक से बचने की इच्छा या तलाक के बाद पुनर्विवाह की समस्या, आदि तो नर भैरवी यंत्र ही आपके लिए एकमात्र समाधान है।

दाम्पत्य जीवन, साझेदारी के व्यवसाय व प्रेम संबंधों में सफलता के लिए केवल यही एकमात्र अचूक लाभदायक उपाय है। अपने प्रति दूसरों को आकर्षित करने की इसमें अदभुत क्षमता है। यह अति गोपनीय यंत्र है । पाकेट व लाकेट के रूप में भी बाजार में उपलब्ध है।

ग्रह बाधा तंत्र बाधा तथा पारिवारिक कारणों से विवाह में देरी दांपत्य जीवन में असफलता , संतान बाधा व व्यावसायिक असफलताओ को दूर करने में भैरवी यन्त्र लाभदायक होता है ।

नितिन कुमार पामिस्ट



कुंडली में शनि विष योग



शनि विष योग निवारण के लिए अचूक उपाय

जन्मपत्री में चन्द्रमा मन, माता, निद्रा, प्रसन्नता, चेहरे की कान्ति, धन, भाग्य, यात्रा व मानसिक स्थिति का कारक होता है।

कुंडली में शनि विष योग

यह शरीर में जल का प्रतिनिधित्व करता है। शनि ग्रह सामान्यतया आयु मृत्यु बीमारी, संकट दुर्भाग्य, दरिद्रता, उदासी, अनैतिक व्यवहार व दुखों का कारक होता है। यदि जन्मपत्री में शनि चन्द्र की युति हो या चन्द्र पर शनि की दृष्टि हो तो शनि चन्द्र विष योग का निर्माण होता है जिसे अधम योग कहा जाता है। इसके दुश्प्रभाव से जातक को जीवन में निरन्तर उदासीनता, दुखों, भाग्यहीनता, शारीरिक कष्ट, मानसिक अशांति व निराशा का सामना करना पड़ता है। यदि चन्द्रमा पर युति या दृष्टि द्वारा राहु का प्रभाव हो तो भी जातक को इन्हीं कष्टों का सामना करना पड़ता है। यह दुर्योग यदि भाव कुण्डली में बन रहा हो भी समान रूप से कष्टदायक होता है। महिलाओं के लिए यह योग अत्यधिक कष्टकारक होता है। इसके दुश्प्रभाव से शरीर में जल की कमी होती है।

इसके कारण शरीर में स्त्री रोग, रक्त की कमी, गैस, सिर दर्द, कमर दर्द व विभिन्न कष्टकारक रोग उत्पन्न होते हैं। इस योग के दुश्प्रभाव के कारण महिलाओं के हारमोन्स में खराबी तथा विभिन्न प्रकार के स्त्री रोगों का निर्माण होता है। ऐसी महिलायें तंत्र बाधा का शिकार भी प्राय: हो जाती हैं जिस कारण उनकी भूख व प्यास में काफी कमी आ जाती है। सामान्य लगने वाले इन रोगों की परिणति कई बार अति कष्टदायक व असाध्य रोगों में होती है।

शनि चन्द्र विष योग के कारण होने वाले दुष्प्रभावो को दूर करने के लिए शनि चंद्र विष योग निवारण लॉकेट और यंत्र के साथ दो विशिष्ट रत्नों (गोमेद और लहसुनिया) का प्रयोग किया जाता है । यदि आपकी जन्मपत्री में चन्द्रमा किसी भी प्रकार से शनि या राहु के दुश्प्रभाव में है तो आप भी इस लाकेट को धारण करके अपने जीवन से निराशा, उदासीनता, मानसिक तनाव को समाप्त करें व विभिन्न रोगों को दूर करके निरन्तर सुख समृद्धि तथा मानसिक शांति प्राप्त कर सकते है ।

नितिन कुमार पामिस्ट



वास्तु कलश



अपने व्यावसायिक स्थल व घर में निरंतर समृद्धि के लिए घर में रखें - वास्तु कलश

यदि जातक अपने लिए स्वयं मकान का निर्माण करवा रहा है तो वास्तुशास्त्र के नियमों के पालन से परिवार को अधिक सुखी व सम्पन्न बना सकता है। परन्तु जब आप बने बनाये मकान या फ्लैट में रहते हैं तो इन नियमों का पालन करना कठिन हो जांता है, इसके अतिरिक्त वहाँ तोड़फोड़ और परिवर्तन करने के पश्चात् भी वास्तुशास्त्र के मूल नियमों
का पालन करना मुश्किल होता है।

वास्तु कलश


वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार पूर्व में स्नान घर, आग्नेय में रसोई घर, दक्षिण में शयनकक्ष, नैऋत्य में प्रसाधन कक्ष, वायव्य में पशुशाला, उत्तर में कोषागार, ईशान में पूजाघर तथा पश्चिम में भोजन कक्ष होना चाहिए। व्यवहार में यह पाया गया है कि जिन घरों में शौचालय ईशान कोण में बने हुए हैं, उन्हें वहां से परिवर्तित करने के लिए अन्यत्र कोई स्थान उपलब्ध नहीं हो पाता और पारिवारिक सदस्य विपरीत परिणामों को सहन करने के लिए विवश होते हैं। पिछले अनेक वर्षों के निरन्तर अनुभवों के आधार पर सौभाग्य दीप के विद्वानों द्वारा जन सामान्य को इन विपरीत परिणामों से राहत दिलाने के लिए एक विशेष वास्तु कलश का निर्माण किया गया है। इसके प्रयोग से जातक को मिलने वाले अनिष्ट प्रभाव काफी कम हो जाते हैं। इस कलश के प्रभाव से जीवन अधिक सुखमय व शांतिपूर्ण हो जाता है। यह वास्तु कलश विभिन्न वास्तु दोषों के कारण घर में उत्पन्न होने वाली नकारात्मक ऊर्जा का शमन करता है। यह घर में शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण एवं प्रगति का वातावरण उत्पन्न करता है। सौभाग्य दीप द्वारा अपने अनेक नियमित ग्राहकों को यह दिया गया है तथा इसके प्रयोग से उनके जीवन में सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इस विशिष्ट वास्तु कलश में (1) वास्तु यंत्र (2) श्री यंत्र (3) नाग नागिन का जोड़ा (4) गोमती चक्र (5) कौड़ी (6) अक्षत (7) धातु का कछुआ (8) पंचरत्न (9) भाग्यवर्धक सिक्के (10) लक्ष्मी वर्धक सिक्के (11) स्वास्तिक पिरामिड तथा वास्तु प्रयोगों से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण सामग्री का समावेश किया गया है। इसे घर या व्यावसायिक स्थल के किसी ऐसे स्थान पर रखा जा सकता है जहाँ पर वास्तु दोष अत्यधिक हों। इसका प्रभाव पूरे स्थल व परिवार को शीघ्र ही प्राप्त होने लगता है। इससे जहां घर में समृद्धि व प्रगति मिलती है, वहीं परिवार में आपसी प्रेम की वृद्धि होती है। व्यावसायिक स्थल पर नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करके यह तनावमुक्त तथा निरन्तर समृद्धिदायक वातावरण का निर्माण करता है। बड़े आवासीय भवनों तथा व्यावसायिक स्थलों के लिए स्पैशल वास्तु कलश का प्रयोग किया जाता है।

नितिन कुमार पामिस्ट



जन्म कुण्डली मिलान



जन्म कुण्डली मिलान का तात्पर्य विवाह के दृष्टिकोण से वर तथा वधू की कुण्डली में सामंजस्य देखने से है। मोटे तौर पर वर तथा वधू के नक्षत्र के चरण को आधार मानकर उनके गुण दोष देखना होता है। इसका प्रचलन प्राचीनकाल से ही है। समाज के धनी व पढ़े लिखे व्यक्ति प्राचीन काल से ही विद्वान ज्योतिषियों से सलाह लेते थे तथा अपने महत्वपूर्ण कार्यों को उनके परामर्श के आधार पर ही आरम्भ करते थे। मेरा उददेश्य केवल इतना बताना है कि विद्वान ज्योतिषियों की विद्वता का सम्मान हमेशा से रहा है।


आज भी अनेक ज्योतिषियों की एक बार की फीस हजारों रूपये में है जबकि किसी मन्दिर में बैठने वाले या घटी बजाकर भगवान को प्रसन्न करने वाले पंडितों को ज्योतिष कार्य के लिए 5,11, 21 या 51 रुपये की दक्षिणा ही मिलती है। आज सामान्य स्थिति यह है कि जो व्यक्ति अपने पुत्र या पुत्री के विवाह में की जन्म कुण्डली का मिलान करवाने के लिए ज्योतिषी को 100 रूपये भी नहीं देना चाहता । यह अलग बात है कि यदि लाखों रूपये का अपव्यय करने के बाद भी विवाह असफल हो जाता है तो तलाक के लिए कोर्ट कचहरी में दस वर्ष से अधिक का समय लगाना पड़ता है। वकीलों की फीस समय की बरबादी, सामान की कीमत आदि से संबंधित यदि इस खर्च को जोड़ दिया जाये तो यह विवाह पर खर्च की गई धनराशि से प्रायः दुगनी हो जाती है। केवल कुछ ही इतने भाग्यवान होते हैं जिनका तलाक एक-दो वर्ष में निपट जाता है। हमारी राय तो ऐसे व्यक्तियों के लिए यही होती है कि ऐसे मामलों को परिवार व समाज के स्तर पर हल करके कोर्ट कचहरी से शीघ्र तलाक ले लेना चाहिए। प्राय: तलाक के बाद भी ऐसे व्यक्ति एक दूसरे की कमियों या अपनी पारिवारिक परिस्थितियों को ही देखते हैं, जन्म कुण्डली का विश्लेषण किसी योग्य विद्वान से नहीं करवाते | दो बार विवाह असफल हो जाना आजकल सामान्य बात है। मेरे स्वयं के कुछ ऐसे ग्राहक हैं जो तीसरे या चौथे विवाह में सफलता का प्रयास कर रहे हैं। कुछ विकसित देशों के निवासियों के लिए तो यह सामान्य बात है। चार-पांच या छ: बार विवाह करना या रिलेशनशिप में रहना उन्हें गलत नहीं लगता परन्तु भारत में आज भी अधिकांश व्यक्ति न चाहते हुए भी पहले विवाह बन्धन में ही जकड़े रहते हैं भले वे आन्तरिक रूप से कितने ही दुःखी क्यो न हो | सामाजिक व पारिवारिक बदनामी के डर के कारण अत्यन्त घुटन सहन करने के बावजूद भी वे तलाक के रास्ते को नहीं अपना पाते। यह एक कड़वी सच्चाई है। आप इसे माने या न माने, यह आप पर निर्भर है। हमारा मुद्दा तलाक की भयावहता की दशांना नहीं, बल्कि केवल इस बात तक सीमित है कि जन्म कुण्डली के आधार पर विवाह को के से सफल बनाया जा सकता है।

विवाह निश्चित करने से पहले गुण मिलान के अतिरिक्त वर या वधु की कुडली में कुछ योगों का स्वतंत्र रूप से अध्ययन करना चाहिए ताकि विवाह के बाद पश्चाताप न हो। जन्म कुण्डली में सप्तम स्थान विवाह का माना जाता है। यदि सप्तम स्थान में पाप ग्रह स्थित है या सप्तम के दोनों ओर अर्थात छठे तथा आठवें भाव में पाप ग्रह स्थित हैं या सप्तमेश पापकर्तरी योग में है, सप्तमेश नीच राशि में है, सप्तम स्थान में स्थित ग्रह नीच राशि में है, सप्तमेश शून्य या अन्तिम अंशों पर है तो दाम्पत्य जीवन में असफलता मिलने की संभावना रहती है। सप्तमेश की एकादश द्वादश या तृतीय भाव में स्थिति भी विवाह में असफलता की कारक है। जन्मपत्री में यदि छठे तथा बारहवें भाव में पाप ग्रह हों तो भी दाम्पत्य सुख नहीं होता। इसके पश्चात् विवाह के कारक ग्रह शुक्र की स्थिति भी देखनी आवश्यक है। शुक्र नीच राशि में है या पाप कर्तरी में है तो भी विवाह में अस्थिरता का योग होता है। कन्याओं की जन्मपत्री में गुरू को विवाह का कारक माना जाता है, इसलिए शुक्र के साथ गुरू पर पड़ने वाले दुश्प्रभाव को भी देखा जाता है।

गुरू अत्यन्त शुभ ग्रह माना जाता है परन्तु यदि गुरू सप्तम भाव में है तथा उस पर एक भी अशुभ ग्रह की दृष्टि है तो विवाह में असफलता की संभावना बनती है। इन सब परिस्थितियों में विवाह तय करने से पूर्व उपाय कर लेना हितकारी होता है। ।

उपरोक्त ग्रह स्थितियों को देखने के पश्चात यह देखें कि क्या वर या वधु की जन्मपत्री में अल्पायु योग तो नहीं है। यदि मारकेश की दशा भी निकट है तो भी सावधानी बरतनी आवश्यक होती है। लग्न, लग्नेश निर्बल है, अष्टम व अष्टमेश पापकर्तरी योग में है चन्द्रमा पक्ष बल में क्षीण व दिग्बल से हीन, पाप दृष्ट या के मदुम योग में है तो भी जातक के जीवन में अनेक विपत्तियां आने के योग होते हैं। विद्वान ज्योतिषियों के पास प्राय: जानकर व्यक्ति अधिक आते हैं क्योंकि वे उनसे अधिकाधिक मार्गदर्शन लेने की इच्छा रखते हैं। ऐसे में प्रायः ज्योतिषी उनके हित चिन्तन में लग जाते हैं तथा कुछ दुर्योगों की अवहेलना कर देते हैं। अपने अनेक वर्षों के प्रेक्टिकल अनुभव के आधार पर ज्योतिषियों के लिए मेरा यह परामर्श है कि उपरोक्त ग्रह स्थितियां देखने के बाद जन्म कुण्डली में विष कन्या योग तथा गंडमूल नक्षत्र की भी जांच अवश्य करें | आप चाहे वर पक्ष की ओर से कुण्डली मिला रहे हैं या कन्या पक्ष की ओर से, दोनों ही परिस्थितियों में आपकी जिम्मेदारी पूरी ही बनती है। पूरा विश्लेषण करें, | आवश्यक उपाय करवाये तथा उसके पश्चात ही आगे बढ़ने के लिए कहें।

जन्म कुण्डली में विष कन्या योग इन परिस्थितियों में बनते हैं-

1. रविवार, द्वितीया तिथि और शतभिषा या अश्लेषा नक्षत्र में जन्म ।
2. रविवार, द्वादशी तिथि व कृतिक, विशाखा या शतभिषा नक्षत्र ।
3. मंगलवार, सप्तमी तिथि व अश्लेषा, शतभिषा या विशाखा नक्षत्र ||
4. मंगलवार, द्वादशी तिथि व शतभिषा नक्षत्र ||
5. शनिवार, द्वितीया तिथि व अश्लेषा नक्षत्र |
6. शनिवार सप्तमी तिथि व कृतिका नक्षत्र ||
7. शनिवार, द्वादशी तिथि व कृतिका नक्षत्र |

उपरोकत तिथि वार् नक्षत्र कके अतिरिक्त यदि लग्न में शनि, पंचम में सूर्य तथा नवम में मंगल स्थित हो अथवा छठे स्थान में एक पाप ग्रह के साथ दो शुभ ग्रह स्थित हों अथवा छठे स्थान में दो पाप ग्रह तथा लग्न में एक पाप ग्रह व दो शुभ ग्रह स्थित हो तो मी विष कन्या योग बनता है।

अब हम मूल नक्षत्र की चर्चा करते हैं। गडमूल नक्षत्र के संबंध में हमने पूरा विवरण इस अंक में अलग से दिया है।

उपरोक्त के पश्चात् जन्म कुण्डली में मांगलिक दोष का विचार करना भी आवश्यक होता है । यदि जन्म कुण्डली में मंगल पहले, चौथे, सातवें, आठवे या बारहवे भाव में स्थित हो तो मांगलिक दोष माना जाता है । वैसे तो शनि, राहु केतु व सूर्य भी क्रूर ग्रहों की श्रेणी में आते हैं परन्तु मंगल इन सबमें दाम्पत्य जीवन के दृष्टिकोण से अधिक क्रूर माना जाता है। मंगल ग्रह का प्रभाव लग्न से पूरा तथा चन्द्र से आधा माना जाता हे | आजकल आंशिक मंगल का प्रचलन अधिक हो गया है। हमारे देश में कुल आबादी के आधे से ज्यादा डाक्टर तथा इतने ही ज्योतिषी विद्यमान हैं। अब तक अनेक व्यक्ति अधिकांशतः महिलायें मुझे यह समझा चुके हैं कि उनके पुत्र या नहीं। कोई यह समझाने लगता है कि 27 वर्ष के बाद मंगल समाप्त हो जाता है तो कोई इस आयु को 30 वर्ष तथा कोई और 32 वर्ष मानता है। अधिकांश लोगों का यही कहना होता है कि जब यह बालक पैदा हुआ था तो पंडित ने यह बताया ही गया। कुछ का कहना होता है कि यह मंगलवार को नहीं पैदा हुआ, फिर मांगलिक क्यों है। अन्त में स्पष्ट बात यही है कि सबको समझा पाना हमारे बूते से बाहर की बात है। जो समझना ही न चाहे, उसे समझाने का पूरा प्रयास करना हमारी ऊर्जा को नष्ट करना ही होगा । ज्योतिषियों को यह भी समझना चाहिए कि जिस व्यक्ति के भाग्य में ठीक होना भगवान ने नहीं लिखा, वह आपके द्वारा बताए गए उपायों को करेगा ही नहीं। आपका काम रास्ता नहीं। यदि आप उपाय को पूरा करने पर अधिक जोर देंगे तो सामने वाला व्यक्ति यही समझेगा कि इसमें आपका लाभ या स्वार्थ है।

ज्योतिषी को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि कई बार सभी चीजों की अधिकता भी कष्टकारी हो जाती है। 36 में से 33 गुण मिलान होने पर भी तलाक हो जाते हैं। दोनों कुडलियों में ग्रह योग बहुत अच्छे होने पर भी आपसी सामंजस्य ठीक नहीं हो पाता। इसीलिए सावधानी की आवश्यकता होती है।

शहद बहुत ही उत्तम पदार्थ है तथा घी भी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है। परन्तु यदि इन दोनों लाभदायक पदाथों को समान । मात्रा में मिला दिया जाये तो यह विष बन जाता है। ऐसा क्यों है, किसी को पता हो तो हमें अवश्य बतायें। पीतल के बरतन को नीबू के रस से चमकाया जा सकता है परन्तु यदि नीबू का रस पीतल के बरतन में डालकर रख दिया जाए तो यह खराब हो जाता है।

गुण मिलान में वर्ण के लिए 1. वश्य के 2 तारा के 3, योनि के 4 ग्रह मैत्री के 5, गण के 6, भक्ट के 7 तथा नाड़ी के 8 गुण होते हैं। इन सब 36 गुणों में से कम से कम 18 गुण अवश्य मिलने चाहिए।

उपरोक्त विवरण काफी लम्बा हो। चुका है। फिर भी हम यहां उदाहरण के लिए कन्या की कुण्डली का विश्लेषण करते हैं। जातिका की जन्मतिथि 06.06. 1988, जन्स समय- 10 बजकर 16 मिनट सुबह तथा जन्म स्थान-गुड़गांव, हरियाणा है। इस जातिका का विवाह 2012 में हुआ। 2013 में ही उसने एक 1 कन्या को जन्म दिया तथा 2013 में ही उसने अपनी सास की हत्या की | यह कन्या अभी जेल में है। पति ने त्याग दिया है। उसकी जन्मपत्री बनाकर अब हम उसका विश्लेषण करते हैं।



लग्न 24–18, सूर्य 22-00, चन्द्र 07-56, मगल 15-37, बुध 02–06, (व) गुरू 27–00, शुक्र 02-33(व), शनि 06-35, (व) राहु 25-08.

विशोत्तरी दशा- गुरू ग्रह।
13-9-2004 से 13-9-2020
गुरू गुरू 1-11-06_तक | गुरू शनि 14-5-09 तक | गुरू बुध 20-8-11 तक
गुरू केतु 26-07-2012 गुरू शुक्र 27-03-2015, गुरू सूर्य 13-01-2016 गुरू चन्द्र 14-05-2017 गुरू मंगल 20-04-2018 गुरू राहु 13-09-20 तक |
ध्यान देने योग्य बात है कि जन्मपत्री में तीन ग्रह बुध, शुक्र व शनि वक्री हैं। तीन ग्रह वक्री होने पर दाम्पत्य जीवन में अशांति रहती है। प्राय: ऐसे व्यक्तियों को तलाक या जीवन भर क्लेश का सामना करना पड़ता है। इन तीन ग्रहों में जन्मपत्री का सप्तमेश, बुद्धि का कारण ग्रह बुध तथा दाम्पत्य जीवन का कारक ग्रह शुक्र सम्मिलित है। इस कारण से इन सभी में निराशा मिलने के लक्षण हैं। इसके अतिरिक्त जन्मपत्री में सप्तम स्थान पाप कर्तरी योग में हैं। सप्तम स्थान दाम्पत्य जीवन का माना जाता है। इसके एक और शनि व दूसरी ओर राहु स्थित है | यह योग दाम्पत्य जीवन की प्रसन्नता का विनाश करने के लिए पर्याप्त है। ऐसे योग में हम प्रायः व्यक्ति को वट वृक्ष की पूजा का उपाय बताते हैं। यह उपाय विवाह से पूर्व किया जाना चाहिए। इसका प्रभाव काफी लाभदायक पाया गया है। जन्मपत्री में एक और दुर्योग है। वह है चन्द्रमा के साथ राहु की स्थिति तथा उस पर शनि की दृष्टि। यह योग स्त्रियों के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही कष्टकारी है। इस दुर्योग का दुश्प्रभाव यह होता है कि इस योग से पीड़ित स्त्रियां प्रायः पानी व दूध बहुत कम पीती हैं। उनके खाने की मात्रा भी कम होती है। धीरे-धीरे कमजोरी, आलस्य, पेट दर्द, सिर दर्द तथा स्त्री रोग आदि को कारण परेशानी होती है। ऐसी महिलायें तंत्र बाधा का शिकार शीघ्र होती हैं। इस दुर्योग का दुश्प्रभाव दूर करने के लिए शनि / राहु विष निवारण लाकेट धारण करना आवश्यक होता है। अति विकट रोगों (असाध्य रोगों) तथा मानसिक अस्वस्थता को दूर करने के लिए भी यह एकमात्र उपाय है। अब हम इस बात पर विचार करते हैं कि क्या कन्या की कुण्डली में. विष कन्या योग विद्यमान है। कन्या का जन्म सोमवारं, सप्तमी तिथि वा शतभिषा नक्षत्र के काल में हुआ है। यह योग विष कन्या नक्षत्र के अन्तर्गत नहीं आता परन्तु
अन्य ग्रह स्थितियों ने जन्म कुण्डली को विशिष्ट बना दिया है। पति की माता अर्थात सप्तम स्थान से चतुर्की सीन (कुण्डली का दशम भाव) का स्वामी ग्रह मंगल कुण्डली में अष्टम में स्थित है। इस पर राहु व शनि की दृष्टि मारकत्व के गुणों में वृद्धि करने वाली है। कुण्डली का अष्टम स्थान सामान्यता काष्ठकारक मारक या मृत्युतुल्य कष्ट देने वाला होता है। इसके अतिरिक्त जन्म कुण्डली में बुध जो बुद्धि का सामान्य कारक है, केवल 2 अंशों पर है। दो अंशों पर स्थित बुध ग्रह बुद्धि की वाचालता बढ़ाता है। ऐसे जातक अपना निर्णय देने वाले तथा व्यग्र होते हैं । सोच समझकर कार्य करना अथवा परिणाम की चिन्ता करना उनके लक्षण नहीं होते। इसलिए इस कन्या ने जो सोचा, वह कर दिया | बाद में जब उसे यह होश आया कि उसने यह सब गलत कर दिया तो उसने इस घटना के संबंध में अपने पति को फोन किया | पति ने पड़ोसियों से सम्पक किया और पड़ोसियों ने पुलिस से सम्पर्क किया। 2013 से ही यह कन्या जेल में है। स्वास्थ्य खराब होने के कारण वर्ष 2016 में इसे 15 दिन की जमानत मिली तथा इसके बाद दो-तीन माह यह बाहर रही | वर्तमान में यह जेल में ही है। इसे विवाह तय करने से पहले उपाय करना चाहिए था ताकि इसका दाम्पत्य जीवन ठीक से चल पाता । चन्द्रमा पर शनि व राहु का प्रभाव हारमोन्स की खराबी देते हैं। पानी की कमी व खाने में अव्यवस्था के कारण उसके शरीर में रक्त की कमी होती है। केतु दूसरे स्थान में है। यह जातिका को क्रोधी परन्तु सत्यवादी बनाता है। जब ऐसी जातिका को क्रोध आता है तो आवेश में वह सब कुछ भूल जाती है। उसे यह भी याद नहीं रहता कि जिस पति के साथ उसने जीवन भर रहने की कसम खाई है उसे इतना अधिक प्रताड़ित न करे। विडंबना यह होती है कि जब क्रोध शांत होता है और आवेश में कमी आती है तो यह सब कुछ याद नहीं रहता। इसीलिए ऐसी जातिकाएं केवल इतना ही कहती हैं कि उसे कुछ भी याद नहीं है या उसने ऐसा कुछ कहा ही नहीं है, फिर माफी क्यों मागे | यह इस दुर्योग का सामान्य लक्षण है। ऐसी जन्मपत्रियां प्राय: हमारे पास आती ही रहती हैं । हमने जातिका का सही जन्म विवरण व सही जन्मपत्री दी है। जाति का अभी जेल में बन्द है। उसकी कन्या अपनी नानी को पास है । हमारे अनेक पाठक अति विद्वान व ग्रह योगों की गणना करने में सक्षम हैं। यदि वे इस कुण्डली में कोई अन्य योग खोज सके तो हमें अवश्य सूचित करें। ज्ञानवर्धन के लिए हम हमेशा आभारी रहेंगे । ब्लॉग में पृष्ठ संख्या की सीमा को ध्यान में रखते हुए हमने सारा विवरण संक्षेप में दिया है।

नितिन कुमार पामिस्ट



पारद शिवलिंग के चमत्कार



भगवान शिव की अपार कृपा प्राप्त करने के लिए आज ही लाय

पारद भगवान शिव की धातु है। पारद से बनाई गई देवी देवताओं की मूर्तियां तथा अन्य पूजा सामग्री शीघ्र फलदायक होती है। पारे से बना शिवलिंग बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। इसकी स्थापना मकान, घट, दुकान, कार्यालय तथा वाहन आदि में की जाती है।


यह बहुत पवित्र माना जाता है तथा घर में रखने पर इस पर जल चढ़ाने की आवश्यकता नहीं होती। इसके नित्य दर्शन से अनेक पापों का नाश होता है। शनि की डैय्या व साढ़ेसाती, शनि राहु की दशा, कालसर्प योग, आशिक कालसर्प योग व पितृदोष से प्रभावित व्यक्तियों के लिए यह श्रेष्ठ फलदायक पाया गया है। मानसिक अशान्ति तथा शारीरिक व्याधियों को दूट कटके यह आर्थिक समृद्धि देने में सक्षम होता है। इसके सामने 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र का जाप तुरन्त फलदायक होता है। पारद शिवलिंग वास्तुदोषों के निवाटण में भी सहायक होता है। यदि किसी वास्तुशास्त्री ने आपके घर में वास्तुदोषों को दूट करने की सलाह दी है तो आप तोड़-फोड़ करने से पहले अपने घर में विधिवत् पारद शिवलिंग की स्थापना करें। अधिकांश वास्तुदोषों का प्रभाव अपने आप ही समाप्त हो जाएगा। पारद शिवलिंग की स्थापना से व्यक्ति को भगवान शिव की कृपा साक्षात् प्राप्त होती है। पारद शिवलिंग घर बैठे प्राप्त करने के लिए कृपया हमें इन फोन नम्बर पर व्हाट्सएप्प करें : 8696725894

नितिन कुमार पामिस्ट



जन्मपत्री से जाने उपाय



आपकी जन्मकुंडली और उसके सरल उपाय

क्या आपको अपना जन्म समय, जन्म तिथि व जन्म स्थान मालूम है? यदि हां तो आपने अपनी जन्मपत्री भी बनवाई होगी और आवश्यकता पड़ने पर उस जन्मपत्री के आधार पर आपने ज्योतिष सम्बन्धी उपाय भी किये होंगे | यदि आपको ज्योतिष के उपायों से कोई लाभ नहीं मिल पाया है और आपका विश्वास ज्योतिष से उठ गया है तो उसके प्रमुख कारण केवल दो या तीन ही हो सकते हैं-

जन्मपत्री से जाने उपाय


1. आपकी जन्मपत्री में गणनाएं
गलत हैं। दिल्ली के नेहरू प्लेस में ज्योतिष के अनेक साफटवेयर 100-200 रू. में मिल जाते हैं। इन नकली साफटवेयरों के आधार पर बनाई जाने वाली जन्मपत्रियों में गणनाएं गलत या अधूरी होती हैं जिन्हें सही मानकर ज्योतिषी द्वारा की गई भविष्यवाणी गलत हो जाती है।

2. आपने इन्टरनैट से मुफ्त में साफटवेयर डाउनलोड करके अपनी जन्मपत्री बना ली है तथा उसमें दिये गये फलित का अध्ययन भी कर लिया है। हमारे अनुभव के आधार पर इन्टरनेट पर काफी कूड़ा कचरा भरा हुआ है जो पाठकों के दिमाग को काफी अच्छे तरीके से भ्रमित कर देता है। अधिकांश व्यक्तियों की आवश्यकता से अधिक जानकारी हो जाती है तथा इसी के आधार पर ही वे अपने आपको गुरू समझने लगते हैं। रिलायंस जियो कम्पनी का सिम मुफ्त में मिलना जब से शुरू हुआ है तब से ऐसे भूले भटके स्वयं उपजे ज्योतिष के जानकारों की बहुत बड़ी बाढ़ देखने को मिल रही है। प्रभु स्वयं इनकी रक्षा करें।

3. आपने जिस ज्योतिषी से सलाह ली है उसने ज्योतिष का अध्ययन नहीं किया है और वह इस काम को पार्ट टाईम या केवल धनकमाने के उददेश्य से ही कर रहा है। ध्यान रहे ज्योतिष शास्त्र बहुत ही कठिन व लम्बी गणनाओं पर आधारित ज्ञान है और सही गणनाओं व भविष्यवाणियों के लिए व्यापक अध्ययन क्व दीर्घ अनुभव की आवश्यकता होती है। अधिकांश व्यक्ति मंदिर में पूजा पाठ करने वाले, अध्यात्मिक प्रवचन करने वाले तथा टी वी चैनलों में निरन्तर व्याख्यान देने वाले व्यक्तियों को ज्योतिषी हैं तथा धोखे का शिकार होकर अपने समय व धन का नाश करते हैं। ऐसे लोगों का सीधा काम ज्योतिष के नाम पर लग्गी करना, जन्म कुण्डली के आधार पर सही व गलत रत्न बेचना या तंत्र के नाम पर धन लूटना होता है। आप जब भी किसी ज्योतिषी के पास जाएं तो उसे आपकी समस्या व उसका समाधान स्वयं बताने दें | जो ज्योतिषी आपकी समस्या व उसका कारण नहीं बता सकता, उसके द्वारा बताया गया समाधान भी गलत ही होगा | गलत उपाय करने से आपकी समस्या और बढ़ेगी | समस्या बतायें, आसान हल पाये, इस स्लोगन वाले व्यक्ति ज्योतिषी नहीं होते, वे किसी भी क्षेत्र के सलाहकार हो सकते हैं।

जीवन में अपने सामने आने वाली विभिन्न समस्याओं के कारण जानने के स्वयं समझें तथा उपयुक्त समय पर इनके लिए आवश्यक उपाय अपनायें। अपने निरन्तर अध्ययन तथा दीर्घ कालीन अनुभव के आधार पर हमने जन्मपत्रो के ग्रह दोषों को दूर करने के लिए विभिन्न उपायों का निर्धारण किया है। इन उपायों का सम्बन्ध जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं से है। मोटे तौर पर हमने इन उपायों को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा है।

1. तत्काल लाभ के उपाय-
इसके अन्तर्गत आपको वर्तमान आयु के अनुरूप उपाय आते हैं- जैसे बाल्यकाल में स्वास्थ्य व शिक्षा, युवावस्था में उच्च शिक्षा, नोकरी, व्यवसाय व विवाह से संबंधित उपाय प्रौढ़ावस्था में संतान से कष्ट या व्यवसाय व स्वास्थ्य को ठोक रखने तथा वृद्धावस्था में स्वास्थ्य, मान–प्रतिष्ठा तथा आर्थिक स्थिति को ठीक रखने के उपाय ।

2. स्वास्थ्य बाघा दूर करने को उपाय-
जन्मपत्री के अनुसार स्वास्थ्य में जो बाधायें आने की सम्भावना है उन्हें दूर करने के सभी आवश्यक उपाय ।

3. जन्मपत्री में यदि मांगलिक दोष है तो उससे संबंधित आवश्यक उपाय ।

4. जन्मपत्री में यदि कालसर्प योग है तो आवश्यक सावधानियां व उपाय ।

5. जन्मपत्री में यदि केमदुम योग है तो उसे दूर करने के उपाय । केमदुम योग का यदि उपाय न किया जाए तो अन्य सभी उपाय प्राय: फल नहीं दे पाते | आप कितने भी मंहगे रत्न धारण कर ले फिर भी के मद्रम योग होने पर आपको उनका लाभ नहीं मिल पाता।

6. यदि जन्मपत्री में गंडमूल योग है तो 27 वें दिन वही नक्षत्र आने पर उसकी पूजा होती है। बाद में की गई पूजा का कुछ भी लाभ नहीं मिलता | गडमूल नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति को जिस उपाय से लाभ मिलता है उसका पूरा विवरण।

7. दाम्पत्य बाधा को दूर करने के लिए विवाह तय करने से पहले कुछ ऐसे सामान्य उपाय किये जाते हैं जिनका प्रभाव अचूक होता है तथा उन पर धन भी खर्च नहीं करना होता। कुछ उपाय बाद में भी किये जा सकते हैं।

8. नौकरी या व्यवसाय में आने वाली रूकावटों को दूर करने के उपाय ।

9. साढ़ेसाती की अवधि का पूरा विवरण तथा उस अवधि में किये जाने वाले आवश्यक उपाय |

10. पितृदोष या तंत्र बाधा के सभी लक्षण तथा यदि आप उससे पीड़ित हैं तो आपके लिए लाभदायक उपाय ।

11. आपके लग्न के आधार पर आजीवन लाभदायक रत्नों का विवरण।

12. आपके लग्न के आधार पर आजीवन लाभदायक रूद्राक्षों का विवरण।

13. नवग्रह मंत्र व दान पदार्थ ।

14. ऋण रोग व शत्रु नाशक उपाय | इन सब उपायों का विवरण इस ही ब्लॉग में दिया गया है। सर्वप्रथम आपके जन्म समयः, तिथिः व स्थानं के आधार पर आपको जन्मपत्री तैयार की जाती है तथा उसके पश्चात् जन्मपत्री में स्थित ग्रहों का अध्ययन करके उपरोक्त 14 शीर्षकों के अन्तर्गत अनावश्यक विवरण तैयार किया जाता है जो जातक के लिए आजीवन लाभदायक होता है।

नितिन कुमार पामिस्ट



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