Tuesday, March 28, 2017



केन्द्रुम योग शांति के उपाय

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केन्द्रुम योग का दुष्प्रभाव व शांति के उपाय

जन्म कुंडली में चन्द्रमा व्यक्ति की मानसिक स्थिति, भाग्यवृद्धि तथा सामान्य स्वास्थ्य का कराक माना जाता है। यदि चन्द्रमा पक्षबल व दिग्बल में मजबूत हो तथा इसके दोनों ओर मंगल, बुध, शुक्र व शनि ग्रहों में से कोई भी ग्रह स्थित हो तो चन्द्रमा को बलवान माना जाता है । चन्द्रमा जब बली होता है तो व्यक्ति स्वस्थ, मानसिक रूप में सुदृढ़ तथा भाग्यवान होता है। उसे अपने सभी कायों में निरन्तर सफलता मिलती रहती है। परन्तु यदि चन्द्रमा के दोनों ओर उपरोक्त में से कोई भी ग्रह न हो तो चन्द्रमा निर्बल माना जाता है जिस कारण ऐसे व्यक्ति को भाग्यवृद्धि नहीं मिलती है। यहां तक कि कार्य पूर्ण हो जाने से तुरन्त पहले तक उसे असफलता मिलने की स्थिति बनी रहती है तथा अंतिम समय में बने हुए कार्य भी बिगड़ जाते हैं। व्यक्ति हमेशा निराश, परेशान व उदासीन रहता है तथा अकेले रहने की भावना अधिक होती है। ऐसा व्यक्ति सदा असमंजस की स्थिति में रहता है। वह बहुत जल्दी विचलित व असहज हो जाता है।

केन्द्रुम योग शांति के उपाय

प्राय: ऐसे व्यक्ति की माता का स्वास्थ्य भी खराब रहता है। ऐसे व्यक्ति को हमेशा दूसरों के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। अपने निर्णयों को वह शीघ्र परिवर्तित कर देता है।

यदि चन्द्रमा दिग्बल से हीन भी हो अर्थात् जन्म लग्न से दशम स्थान में स्थित हो तो जातक को उसकी मेहनत का फल नहीं मिलता। उसके द्वारा किये गए कार्यों की सराहना नहीं होती । यह स्थिति उसके सभी कायों को विपरीत रूप से प्रभावित करती है। ऐसे व्यक्ति प्राय: आजीवन मेहनत करते रहते हैं परन्तु वे अपने कार्यक्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाते। ऐसे व्यक्तियों को जीवन में अनेक बार आर्थिक संकटों का सामना भी करना पड़ता है। चन्द्रमा के एक ओर यदि सूर्य अथवा राहु केतु हो तो यह अति अशुभ केमदुम योग बनता है। इसके दुश्प्रभाव से व्यक्ति की मानसिक स्थिति अशांत होती है तथा वह स्वयं को अकेला, उदासीन, निराश व असहाय पाता है। ऐसे व्यक्ति गलत संगति की ओर आसानी से आकर्षित हो जाते हैं। उनमें अपने स्वयं के बल व जिम्मेदारी पर निर्णय लेने की सामथ्र्य नही होती | चन्द्रमा यदि सूर्य के नज़दीक हो तो वह पक्ष बल में क्षीण होता है तथा अपना पूरा प्रभाव नहीं दे पाता। चन्द्रमा के एक ओर राहु होने से व्यक्ति को निराशा व उदासीनता अधिक मिलती है जबकि चन्द्रमा के एक ओर केतु होने से ऐस् व्यक्ति नये नये विचारों व योजनाओं : खोया रहता है तथा अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने व पूर्ण करने वह असमर्थ होता है जबकि परिवर्तन में वह अग्रणी होता है।

अब हम उदाहरण के रूप में एक जन्म कण्डली यहां दे रहे हैं। य कुण्डली एक बालिका की है जो भारतीय मूल की है। उसका जन् विदेश में हुआ तथा अब भी वह विदे: में ही रहती है। एक विदेशी क कुण्डली में ग्रह दोषों के प्रभाव क साक्षात विवरण देखकर आप सम: पाएंगे कि ग्रह नक्षत्रों की चाल सर्भ पर समान रूप से असर करती है।

नाम-सुकन्या
जन्मतिथि- 11:17 मिनट
स्थान - अमेरिका
न्यूयॉर्क के पास
लग्न-09-56, सूर्य-19-54, चन्द्र-13-18, मंगल-07-18, बुध-16-47, गुरू-11-38, शुक्र-19-46, शनि-21-18, राहु-06-04

स्थान - अमेरिका  न्यूयॉर्क के पास

जन्मपत्री में लग्नेश मंगल मित्र राशि में, पंचमेश व धनेश गुरू स्वगृही, लाभेश बुध स्वगृही, द्वादशेश शुक्र स्वगृही चतुर्थ केन्द्र का स्वामी शनि उच्च राशि में स्थित है। तीन ग्रह स्वगृही व चतुर्थ केन्द्र का स्वामी शनि उच्च राशि में स्थित है। तीन ग्रह स्वगृही तथा एक उच्च राशि में होने पर जातिका का जीवन अत्यन्त सुखी होना चाहिए। यहां बुध ने स्वगृही व बली होकर उच्च विद्या प्रदान की आर्थिक स्थिति धनेश स्वगृही होने के कारण अच्छी है, काम की भी कमी नहीं है। शुक्र पाप कर्तरी योग में है, इसलिए दाम्पत्य जीवन में परेशानी स्वाभाविक है। दाम्पत्य जीवन में अलगाव को रोकने के लिए उन्होंने उपाय करने नहीं है क्योंकि विदेशी प्रभाव है। एक विवाह टूट चुका है, दूसरा टूटने के कगार पर है। लिव इन रिलेशन में रहना सामान्य बात है। चार पांच बार तलाक होना वहां पर एक सामान्य बात है। हमारा उद्देश्य दाम्पत्य सुख का विश्लेषण करना नहीं है यह लेख केमद्रुम योग से संबंधित है| चन्द्रमा मन का कारक है भाग्य का कारक है। अकेला होने के कारण मानसिक अस्थिरता और भाग्यहीनता होना स्वाभाविक है। विवाह टूटने परमानसिक अशांति होना स्वाभाविक है। लिव इन रिलेशनशिप में भी अकेलापन अनुभव होता है। जीवनसाथी बदलने से व्यक्ति का अन्तर्मन टूटना स्वाभाविक है। केमदुम योग में होने पर भी चन्द्रमा दिम्बली है और इस पर किसी भी शुभ या अशुभ ग्रह का प्रभाव नहीं है। विदेश में रहने पर अधिकांश महिलाओं को काम करना पड़ता है, इसलिए दिन का समय व्यस्तता में व्यतीत हो जायेगा परन्तु रात्रि में घर लौटते समय व्यक्ति के मन में जो विचार आते हैं वे तो जीवन की अस्थिरता दिखाने वाले ही रहेंगे। भारतीय संस्कार समय के साथ बदल जाते हैं। ऐसे में केमटुम योग की कुण्डली व्यक्ति को हर प्रकार से तनाव, भाग्यहीनता व इसी प्रकार के अन्य दुश्प्रभावों का अहसास कराती ही रहेगी |

यदि आपकी जन्मपत्री में भी केमट्टम योग बनता है तो आपको इसके दुश्प्रभाव दूर करने के लिए आवश्यक उपाय अपनाने चाहिए। चन्द्रमा को बली बनाने के लिए जो भी उपाय आपके लिए संभव हों, वे आप अवश्य अपनाएं ताकि आप अपने भविष्य को अधिक भाग्यवान, उज्ज्वल व समृद्ध बना सकें। केमदुम योग का दुश्प्रभाव दूर करने के लिए आपके लिए लाभदायक उपाय इस प्रकार हैं :-

1. आप प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा उपासना करें। भगवान शिव कें मंत्रों का जप करें तथा भगवान शिव से संबंधित तीर्थस्थलों की यात्रा करें।

2. चन्द्र ग्रह के मंत्र का प्रतिदिन जप करें। मंत्र है- “ऊँ श्रां श्रों श्रों स: चन्द्रTय जनाःम: I'

3. केमदुम योग के दुश्प्रभावों को दूर करने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय जन्मपत्री में दुरूधरा योग का निर्माण करना होता है जो चन्द्रमा को बलवान बनाकर अति श्रेष्ठ फल देता है। व्यक्ति को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर व महवकांक्षी बनाने के लिए यह योग सहायक होता है। इसके लिए एक विशेष केमदुम योग शांति यंत्र के नीचे चन्द्र रत्न मोती लगाकर उसके एक ओर बुध रत्न पन्ना व दूसरी ओर बृहस्पति रत्न पुखराज लगाया जाता है। इसके प्रभाव से चन्द्रमा के बल में वृद्धि होती है व व्यक्ति मानसिक रूप से अति सुदृढ़, शारीरिक रूप से बलवान तथा भाग्यवान बनता है। निराशा की भावना दूर होती है जिससे जातक जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाकर निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर होता हे | आर्थिक व्यावसायिक व पारिवारिक जीवन में उसे प्रगति मिलती है। जातक को भाग्यवृद्धि भी प्राप्त होती हे |

4. यदि आप इस दुर्योग से पीड़ित हैं तो आप विशिष्ट केमुद्रम योग शांति लॉकेट धारण करें। आप केमटुम शांति यंत्र में तीन रत्न लगाकर धारण करें। मध्य में चन्द्र रत्न मोती लगाये तथा इसके दोनों ओर अपनी जन्मपत्री के आधार पर एक-एक लाभदायक रत्न लगायें । मोती के दोनों ओर लगाये गये रत्नों के प्रभाव से चन्द्र ग्रह की बल मिलेगा तथा आप केमुद्रम योग के दुश्प्रभाव से बचे रहेंगे। जीवन में निरन्तर प्रगति करने, मानसिक स्थिति को मजबूत करने, पारिवारिक जीवन में सुख व शांति प्राप्त करने, सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्रों में प्रगति प्राप्त करने व अन्य के लिए यह आपके लिए सर्वश्रेष्ठ लाभदायक उपाय है। हमारे अनुभव के आधार पर यह लॉकेट धारण भाग्यवर्धक सिद्ध होता हे | जिस व्यक्ति की जन्मपत्री में केमदुम योग लॉकेट धारण नहीं करता परन्तु अपनी जन्मपत्री के अनुरूप अन्य अत्यन्त बहुमूल्य रत्न धारण " कर लेता है या कोई अन्य मंहगा उपाय अपना लेता है तो भी उसे वांछित लाभ नहीं मिल पाता। केमदुम शांति लाकेट की विशेषता यह होती है कि वह चन्द्रमा की शक्ति में वृद्धि करके व्यक्ति को मानसिक बल व भाग्य को बढ़ाता है। इससे तनाव व निराशा दूर होती है तथा व्यक्ति में नये आत्म विश्वास का संचार होता है। इसके प्रभाव से उसे अन्य रत्नों व उपायों का लाभ भी मिलने लगता हे |

यदि आप केमदुम शांति लॉकेट धारण करना चाहते हैं तो आप सौभाग्य दीप कार्यालय में सम्पक करें। यदि आप किसी अन्य दुर्योग से भी पीड़ित हैं तो उसी के अनुरूप लाभदायक केमद्रुम योग शांति लॉकेट का आपके लिए चुनाव किया जाएगा | किसी प्रकार की तंत्र बाधा, नजरदोष, स्वास्थ्य में खराबी, प्रेत बाधा दोष आदि से संबंधित समस्याएं भी यदि आपकी जन्मपत्री में होंगी तो आपके लिए प्रत्यंगिरा के मद्रुम लॉकेट धारण करना लाभदायक रहेगा | यदि आपकी जन्मपत्री में दाम्पत्य बाधा या व्यावसायिक बाधाओं के योग अधिक हैं तो नर भैरवी के मदुम लॉकेट धारण करना आपके लिए लाभदायक रहेगा | यदि ऋण, रोग व
शत्रुओं तथा कोर्ट कचहरी या अन्य शासकीय समस्याओं से परेशान हैं तो त्रिवेणी बीसा केमदुम लाकेट धारण करें। आपकी समस्या के अनुरूप ही उपयुक्त उपाय करने से आपको लाभ मिलेगा। केमदुम शांति लाकेट तैयार करने के लिए आपकी समस्या के अनुरूप कौन से यंत्र का लाकेट प्रयोग करना है तथा उसमें किन-किन रत्नों का प्रयोग करना है इसके लिए हमारे अनुभवी ज्योतिषाचार्य आपको पूरा मार्गदर्शन देंगे । धारण विधि व धारण करने के मुहूर्त आदि से संबंधित सभी जानकारी लॉकेट के साथ दी जाती है।

नितिन कुमार पामिस्ट


कर्ज मुक्ति साधना और उपाय

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ऋणमुक्ति कुबेर साधना

जब किसी व्यक्ति की दुर्दशा चलती है तो उसका चलता हुआ । काम बन्द हो जाता है। ऐसी दशा के समय नौकरी करने वाले व्यक्ति भी अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर करने के लिए कुछ न कुछ काम आरम्भ करते हैं तथा अपनी जमा पूंजी से भी हाथ धो बैठते हैं। राहु शनि या शनि राहु दशा, राहु गुरू, शनि गुरू, बुध, शुक्र या बुध गुरू दशा, जो सामान्यतया धन में वृद्धि करने में सहयोगी प्रतीत होती हैं, उनकी अवधि में भी प्राय: जातक का धन अनायाश लुटता चला जाता है और जातक ऋण के दलदल में फस जाता है। ऋणमुक्ति के लिए ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत अनेक प्रयोग दिये गये हैं।

कर्ज मुक्ति साधना और उपाय

यहां हम ऋणमुक्ति के लिए कुबेर साधना का एक अति सरल प्रयोग दे रहे हैं। हमारे पाठक इससे अवश्य लाभान्वित होंगे ।

ऋणमुक्ति के लिए आर्थिक समृद्धि की आवश्यकता होती है। धन की शीघ्र प्राप्ति के लिए हम यहां भगवान कुबेर को प्रसन्न करने का एक प्रयोग दे रहे हैं। पृथ्वी पर सभी धन सम्पत्ति के भण्डार भगवान कुबेर के अधीन आते हैं। यह साधना कोई भी व्यक्ति त्रयोदशी के दिन कर सकता है। इसके लिए असली ताम्रमत्र पर बना चांदी पॉलिश युक्त चैतन्य कुबेर यंत्र, लकड़ी की चौकी, पीला केसरिया वस्त्र, अक्षत, त्रिगन्ध (केसर, कपूर, चन्दन की स्याही) पुश्प माला, घी का दीपक, धूप, इलायची तथा मून स्टोन की माला तथा कुश के आसन की आवश्यकता होती है।

विधि इस प्रकार है-
स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें। उत्तर की ओर मुख करके बैठें। सामने चौकी पर पीला या केसरिया वस्त्र बिछायें। कुबेर यंत्र इस पर रखें। पीले अक्षत भी रखें। धूप बत्ती दायी ओर तथा दीपक बायी ओर प्रज्वलित करें। सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें। उसके पश्चात हाथ में चावल फूल व जल लेकर यह विनियोग पढे-
ऊँ अस्य श्री कुबेर मन्त्रस्य विश्रवा ऋषिर्बृहतीछन्दः शिवर्मित्रं धनेश्वरो देवताऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे र्विनियोगः।

अब न्यास करें-
विश्रवा ऋषये नमः शिरसि वृहति छन्दः नमः मुखे कुबेर देवतायै नमः हृदि अक्षय निधिं सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सवर्गगे |

अब निम्न प्रकार से अंग न्यास करें-
ॐ श्रीं ॐ हृदयाय नमः । ऊ श्रीं सिरसे स्वः। हीं क्लीं शिखायै वषट् । श्रीं क्लीं कवचायै हुम्।
र्वितेश्वराय नेत्र त्रयाय वोषट् । नमः अस्त्राय फट्।

अब कुबेर देवता का ध्यान करें। दायें हाथ में चावल तथा पुश्प लेकर निम्न मंत्र बोलते हुए कुबेर यंत्र पर छोड़े- 'मनुजवाहयाविमान वर स्थित गरूडटत्न निभ निधिनायकम्। शिव भज तुन्दिलम्।" अब यत्र पर त्रिगंध एवं अक्षत अर्पित इलायची तथा लौंग अर्पित करें। अब आसन पर बैठे ही मून स्टोन की माला से 10 माला मूल मंत्र का जाप करें तथा मूल मंत्र से तिल के द्वारा दशांश हवन भी करें। मूल मंत्र इस प्रकार है- 'उ* श्रां ऊँ हाँ श्रां हीं कलां श्रां कलीं र्वित्तेश्वराय नमः ।।'

निष्ठा एवं पूर्ण श्रद्धा से जो भी यह साधना सम्पन्न करता है उसे कुबेर की सन्देह नहीं है। पूजन के पश्चात् भगवान कुबेर से धन-धान्य व समृद्धि की प्रार्थना करते हुए परिवार सहित लक्ष्मी जी की भी आरती करें। सफलता निश्चित है।

नितिन कुमार पामिस्ट


गंडमूल नक्षत्र के उपाय

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गंडमूल नक्षत्र का प्रभाव एवं समाधान

नक्षत्रों की कुल संख्या 27 है। प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं। इन 27 नक्षत्रों में से 6 नक्षत्र ऐसे हैं जिन्हें प्राय: अशुभ फलदायक माना गया है। यद्यपि इन 6 नक्षत्रों के सभी चरण अशुभ नहीं हैं तो भी बालक का जन्म यदि इन नक्षत्रों में से किसी एक के समयकाल में होता है तो परिवार के अन्य सदस्यों व बालक के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव का निराकरण करने के उद्देश्य से उस नक्षत्र की अगली अवधि में अर्थात लगभग 27 वें दिन जब वह नक्षत्र पुनः आता है तो गण्डमूल पूजा के नाम से एक विशेष पूजन विधि का आयोजन किया जाता है| सभी कर्मकांडी विद्वानों को प्रायः इस पूजा की विधि ज्ञात होती है। बालक के पिता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पूजा के उपरान्त ही बालक का मुख देखे। वर्तमान परिस्थितियों में यह संभव नहीं हो पाता | बालक के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह पूजा अति लाभकारी मानी जाती है।

गंडमूल नक्षत्र का प्रभाव एवं समाधान


गण्डमूल नक्षत्रों के अन्तर्गत आने वाले ये 6 नक्षत्र इस प्रकार हैं-
अश्वनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल व रेवती| अश्लेषा नक्षत्र का पहला चरण, मघा का तीसरा व चौथा चरण मूल का चौथा चरण तथा रेवती नक्षत्र के पहले तीन व्रण शुभ फलदायक माने जाते हैं। अश्वनी नक्षत्र का पहला चरण पिता के लिए अशुभ दूसरा धन व ऐश्वर्य देने वाला तीसरा मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि करने वाला तथा चौथा राज्य से सम्मान दिलाने वाला होता है। अश्लेषा नक्षत्र का पहला चरण शांति कराने से शुभ फल देता है दूसरा चरण धन व ऐश्वर्य की हानि तीसरा माता व सास के लिए अशुभ तथा चौथा पिता व ससूर के लिए अशुभ होता है। मघा नक्षत्र का पहिला चरण माता व सास के लिए अनिष्ट, दूसरा पिता व ससुर के लिए कष्टकारक, तीसरा सुख समृद्धि देने वाला तथा चौथा धन आयु व सुख समृद्धि देने वाला होता है। ज्येष्ठा नक्षत्र का पहला चरण बड़े भाई व जेठ के लिए अनिष्टकारक, दूसरा चरण छोटे भाई व देवर के लिए अनिष्ट तीसरा माता व सास के लिए अनिष्ट तथा चौथा स्वयं के लिए अनिष्ट कारक होता है। मूल नक्षत्र का पहला चरण पिता व ससुर के लिए अनिष्ट कारक, दूसरा चरण माता व सास के लिए अनिष्ट, तीसरा चरण धन व आयु में वृद्धि करने वाला तथा चौथा चरण शांति करवाने से शुभ फलदायक होता है। रेवती नक्षत्र का पहला चरण राज्य से लाभ देने वाला, दूसरा मान प्रतिष्ठा देने वाला, तीसरा धन धान्य में वृद्धि करने वाला तथा चौथा चरण आजीवन स्वयं को कष्ट देने वाला होता है।

आप पर गण्डमूल नक्षत्र का प्रभाव -
यदि बालक को जन्म को समय वह नक्षत्र गोचर कर रहा था जो गण्डमूल नक्षत्र को अन्तर्गत आता है तो ऐसी स्थिति में तो 27वें दिन उसी नक्षत्र की अवधि में गण्डमूल शांति पूजा करवाने से बालक का स्वास्थ्य ठीक रहता है तथा व समृद्धि का वातावरण बनता है।

विवाह के लिए जन्मकुंडली मिलान के समय गुण मिलान, मांगलिक दोष व जन्म पत्रिका में उपलब्ध अन्य गुण दोषों के साथ विद्वान ज्योतिषी गण्डमूल नक्षत्रों पर भी विचार करते हैं। कन्या की जन्मपत्री में इस दोष को अति गम्भीर माना जाता है। गण्डमूल नक्षत्रों के दुश्प्रभावों को दूर करने के लिए प्राय: अधिक उपाय प्रचलित नहीं हैं। कुछ विद्वान कर्मकांडी ब्राह्मण इस दुर्योग की शांति के लिए काफी खचली पद्धति का प्रयोग करते हैं। सभी सामान्य जनों के लिए ऐसे उपाय अपना पाना संभव नहीं होता । इसके अतिरिक्त इस बात की गांरटी भी नही होती कि इतने मंहगे उपाय अपनाने से व्यक्ति को लाभ अवश्य मिल जायेगा। हम यहां दो ऐसे उपायों का विवरण दे रहे हैं जो बहुत कम खर्चीले तथा पूरा करने में आसान हैं | ये व्यावहारिक और लाभदायक हैं। इन्हे करते समय आप यथासंभव गोपनीयता बरतें । अपने लाभ के प्रचार करने पर प्राय: उनके फल में न्यूनता देखी जाती है। लाभदायक उपायजिस दिन गोचर में प्रात:काल आपका नक्षत्र आता है उस दिन आपने यह उपाय करना है। प्रात:काल उठकर स्नान करें स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा अपने पूजा स्थान पर बैठकर भगवान विष्णु जी का ध्यान करते हुए इस मंत्र का एक माला पाठ करें- 'ॐ विष्णवे नम:' । इसके पश्चात् उसी दिन प्रात:काल बरगद के वृक्ष की पूजा करके अपने लिए सुख शांति की कामना करें। । इसके लिए आप बरगद के पेड़ पर जल चढ़ायें तथा 3 बार मौली बांधकर अपने सुखी दाम्पत्य जीवन व समृद्ध भविष्य के लिए आशीर्वाद मांगें । यह उपाय आप एक बार अवश्य करें।

इसके पश्चात् आप उपाय इस प्रकार करें-
आप कांसे का एक कटोरा लें । इसमें चीनी या खांड भरें। इसमें एक सिक्का रखें। देसी घी का एक पैकेट अलग से ले लें। इसे आप एक लाल रेशमी रूमाल या वस्त्र में लपेट लें। यह सामग्री आप मन्दिर में जाकर विश्णु भगवान की प्रतिमा के सामने जीवन के लिए आशीर्वाद की प्रार्थना करें। जिस नक्षत्र में आपका जन्म हुआ है, गोचर में जिस दिन वह नक्षत्र आए, उसी दिन यह क्रिया भी आप सम्पन्न करें।

ये दोनों उपाय आप एक ही दिन कर सकते हैं। यह उपाय पूरा करने के लिए दिन व समय का सही चयन अत्यन्त आवश्यक है | गलत समय पर किये गये उपाय से लाभ की आशा नहीं की जा सकती | यह उपाय आपको किस दिन करना चाहिए यह जानने के लिए हमारे " कार्यालय में फोन पर सम्पक करें |

अगर विष्णु जी की प्रतिमा न मिल सके तो भगवान कृष्ण जी की प्रतिमा के सामने यह क्रिया सम्पन्न करें। विवाह तय करने से पहले यह उपाय करने पर अधिक लाभ मिलता है। यदि यह उपाय विवाह से पहले नहीं किया गया है तो विवाह के बाद करने से भी कुछ लाभ मिलने की आशा की जा सकती है। गण्डमूल नक्षत्र में जन्मी कन्याओं के लिए यह उपाय आवश्यक है। पुरूष वर्ग के लिए भी यह उपाय काफी लाभदायक है।

प्रत्येक नक्षत्र के लिए उपाय करने का समय अलग-अलग होता है। उपाय की अवश्यकता का चयन आपकी वर्तमान आयु को अनुरूप ही किया जाता है | प्राय: इन उपायों का | विधान व आवश्यकता न समझ पाने वाले व्यक्ति अनेक परेशानियों से घिरे रहते हैं। यहां आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी कर्मकांडी ब्राह्मण आपको इस प्रकार का कोई उपाय नहीं बतायेगा जिससे आपको न्यूनतम धनराशि करके अधिकतम लाभ मिल सकता हो । गडमूल नक्षत्र क संबंध में मेरा निजी अनुभव यह है कि ब्राह्मण को केवल एक ही उपाय मालूम होता है जिसमें आपके जन्म नक्षत्र के दिन 27 पेड़ों के पत्ते, 27 नदियों का जल, 27 स्थानों की मिट्टी तथा सोने से बनी विष्णु जी मूर्ति की आवश्यकता होती है।

नितिन कुमार पामिस्ट


महिलाओ के दांपत्य बाधा योग व उपाय

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महिलाओ की जन्मपत्री में दाम्पत्य बाधा योग व उपाय

जन्मपत्री में कुछ ऐसे योग होते हैं जिनके कारण दाम्पत्य जीवन में बाधा आने की संभावना बनी रहती है। अगर दाम्पत्य जीवन में बाधा संबंधी योग जन्मपत्री में विद्यमान हों। तो व्यक्ति को दाम्पत्य संबंधी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये समस्याएं मुख्यतया इस प्रकार होती हैं-

महिलाओ का दांपत्य बाधा योग व उपाय

1. विवाह तय होने में निरन्तर विलम्ब होता रहता है।
2. विवाह करने की इच्छा ही नहीं होती।
3. विवाह संबंध तय होने के पश्चात् टूट जाता है।
4. विवाह होने के बाद पति-पत्नी में मन मुटाव रहता है और शीघ्र ही तलाक हो जाता है।
5. विवाह होने के बाद पति-पत्नी में आपसी आकर्षण में कमी हो जाती है तथा कुछ समय बाद तलाक की स्थिति होती है।
6. पति-पत्नी आपस में शत्रुवत् । व्यवहार करते हैं और न चाहते हुए भी विवाह बन्धन में बंधे रहते हैं।
7. तलाक के पश्चात् दूसरे विवाह में भी सफलता नहीं मिलती |

ये सभी परिस्थितियां जन्मपत्री में विद्यमान कुछेक ग्रह स्थितियों के कारण होती हैं। ऐसी परिस्थितियों के लिए जन्मपत्री में जो योग स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं वे हैं- सप्तमेश का नीच राशि में स्थित होना, सप्तमेश ग्रह का शून्य या अंतिम अंशों में होना सप्तमेश या सप्तम स्थान पाप कर्तरी योग में होना, सप्तमेश की एकादश, द्वादश या तृतीय स्थान में स्थिति और उस पर पाप ग्रहों का प्रभाव तीन या चार ग्रह। वक्री होना, शुक्र का नीच या पापकर्तरी में होना या सप्तमेश अथवा शुक्र का पूर्णास्त होना। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य ग्रह स्थितियां भी होती हैं जो इस कष्टकारक योग का निर्माण करती हैं जैसे कन्या का चन्द्र गण्डमूल नक्षत्र में स्थित होना चन्द्रमा या गुरू सप्तम स्थान में स्थित होना या कोई अन्य ग्रह नीच राशि में सप्तम स्थान में स्थित होना जन्मपत्री के छठे व बारहवें स्थान में पाप ग्रहों की स्थितेि होना, कन्या का जन्म वेिष कन्या योग की अवधि में होना आदि। कभी-कभी मंगल दोष भी दाम्पत्य बाधा का एक कारण होता है।

यदि आपकी जन्मपत्री में ग्रह स्थिति के आधार पर इस दुर्योग का निर्माण हो रहा है तो आपको अपने दाम्पत्य जीवन में सफलता के लिए कुछ उपाय अपनाने की आवश्यता रहेगी। हमारा विश्वास है केि इन उपायों को विधिपूर्वक व श्रद्धा से कर लेने पर आपको इन कष्टों का सामना नहीं करन पड़ेगा। आपके लिए उपाय इस् प्रकार हैं-

1. आपके लिए सबसे अधिक लाभदायक, पूरा करने में सरल तथा सबसे कम खर्चीला उपाय इस प्रकार है। यह उपाय आप पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात् करें। इसमें आपको केवल 3 प्रक्रियायें पूरी करनी हैं। यह उपाय करने के लिए आप एक ऐसे बरगद के पेड़ की तलाश करें जिसकी परिक्रमा आसानी से की जा सकती हो | बरगद के पेड़ के साथ कोई दूसरा पेड़ मिला हुआ नहीं होना चाहिए। बरगद के पेड़ की पहचान यह है कि इसकी शाखाओं में से नीचे की अोर जड़े लटकती रहती हैं। इस पेड़ को बड़ का पेड़, बोहड़ या बन्यान ट्री भी कहा जाता है।

पहली प्रक्रिया यह है कि जिस दिन आपने यह उपाय करना है उस दिन प्रात:काल उठकर स्नान करें तथा साफ-सुथरे अच्छे वस्त्र धारण करें | काले या नीले वस्त्र न पहनें। बड़ के पास पहुंचकर पेड़ को भगवान विष्णु का स्वरूप मानते हुए नमस्कार करें तथा एक लोटा जल चढ़ायें। दूसरी प्रकिया के रूप में तीन चक्कर लाल रंग की मोली या कलावा पेड़ के तने पर लपेटें। तीसरी प्रकिया के रूप में बड़ के पेड़ की 108 परिक्रमा पूर्ण करें। इस सारे कार्य को शांतिपूर्ण तरीक से सम्पन्न करने के लिए आप अपने किसी पारिवारिक सदस्य की सहायता भी ले सकते हैं। यह उपाय पूरा करने तक यदि आप निराहार रहे तो अधिक लाभदायक रहेगा। बरगद पर जल चढ़ाते, मौली लपेटते तथा परिक्रमा करते समय आप भगवान विष्णु का ध्यान करें व
'ऊँ विष्णवे नम:' का उच्चारण करते रहे | ये उपाय आपको कब करना है, इसका दिन व समय आप हमारे कार्यालय में स्वय आकर या फोन पर सम्पक करके जान सकते हैं।

2. आप नर भेरवी लॉकेट धारण । करें या अपने पूजा स्थान में नर भैरवी यंत्र स्थापित करें। इसके सामने आप हर रोज तिल के तेल का दीपक जलायें तथा इस मंत्र का पाठ हर रोज 108 बार करें- 'ऊँ त्रिपुराये विद्महे महाभैरव्ये धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।' लॉकेट अथवा यंत्र प्राप्त करने के लिए हमारे कार्यालय में सम्पक करें।

3. आप कात्यायनी देवी जी की पूजा करें। कात्यायनी त्रिशक्ति लॉकेट धारण करना आपके लिए लाभदायक है। कात्यायनी देवी की पूजा के लिए मंत्र इस प्रकार है 'ऊँ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी नन्दगोप सुतं देवि पति मे कुरूते नम:।' या आप प्रतिदिन निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जप करें "हे गौरि शंकर अधांगि यथा त्वं शंकर प्रिया तथा माम कुरू कल्याणि कान्तकान्ताम् सुदुर्लभाम्।" या- "ऊँ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्य देवेन्द्रप्रिय भामिनी । लाभचदेहि मे ।" या- "ऊँ शंकराय सकल जन्मार्जितपाप विध्वंसनाय । पुरूषार्थं चतुष्टयलाभाय च पति में देहि कुरू कुरू स्वाहा।" जिस कन्या के विवाह में बार-बार अवरोध होता है, रिश्ते की बात बनते-बनते बिगड़ जात है या रिश्ता तय होने के बाद भ टूट जाता हैं तो उसे मां कात्यायनी देवी का पूजन व अनुष्ठान करन चाहिए। अनुष्ठान शुरू करने का दिन गुरूवार है। कुल अवधि 21 दिन तथ कुल मंत्र 41,000 जप करने हैं। पहले दिन 1000 तथा दूसरे दिन से 2000 मंत्र प्रतिदिन जप करने हैं। जप की समाप्ति पर दशाश हवन, तर्पण, मार्जन, कन्या भोजन एवं युगल ब्राहमण भोजन करवाना है | घर में कात्यायनी देवी का यत्र लगाये । गणपति पूजन, नवग्रह पूजन व कात्यायनी देवी का पूजन करें। हल्दी की माला, पीले फूल, पोली मिठाई, पीले वस्त्र आदि का प्रयोग करें। एक बार भोजन करें व भोजन में पीली वस्तुओं का प्रयोग करें। पीपल वृक्ष की जड़ में प्रतिदिन (रविवार को छोड़कर) जल डालने तथा दीपक जलाने से विवाह के योग शीघ्र बनते हैं। सूर्यास्त के बाद पीपल पर जल नहीं चढ़ाया जाता |

कन्या के विवाह में बाधा दूर करने का एक अन्य प्रयोग इस प्रकार है-
एक पुराना खुला हुआ ताला लें । चाबी की आवश्यकता नहीं है। इसे कन्या के पूरे शरीर से 7 बार घड़ी की उल्टी दिशा मे उतारें। इस ताले को गुरूवार को रात्रि 9 बजे के समय किसी चौराहे पर रखकर आ जाएं। पीछे मुड़कर न देखें। कन्या के विवाह में आने वाली बाधायें दूर होती चली जाएंगी।

कन्या के विवाह में बाधा दूर करने के लिए सीताजी द्वारा की गई माँ पार्वती की स्तुति से सम्बन्धित प्रसंग का पाठ हर रोज किया जाना चाहिए ।

यह पाठ इस प्रकार है-
श्रीसीताजीकृत गौरी वन्दनाजय जय गिरिबराज किसोरी ।
जय महेस मुख चंद चकोरी।
जय गाजबदन षडानन माता |
जगत जननि दामिनि दुति गाता ।।
नहि तव आदि मध्य अवसाना ।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।
भव भव विभव पराभव कारिनि |
बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि | |
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव देख |
महिमा अमित न सकहि कहि सहस सारदा सेष ।
सेवत तोहि सुलभ फल चारी ।
बरदायनी पुरारि पिआरी |
देवि पूजि पद कमल तुम्हारे |
सुर , नर मुनि सब होहिं सुखारे।
मोर मनोरथु जानहु नीको ।
बसहु सदा उन पुर सबही कें।
कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहीं।
उस कहि चरन गहे बैदेहीं।
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी।
सादर सियें प्रसादु सिर धरेऊ।
बोली गौरिहरपुहियें भरेऊ।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजह मून कामना तुम्हारी।
नारद बचन सदा सुचेि साचा |
सो बरू मिलिहि जाहिं मनुराचा||
मनु जाहिं राचेल मिलिह सो बरू सहज सुंदर साँवरो।
हसुन जाइ कहैि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे।

नितिन कुमार पामिस्ट



आंशिक कालसर्प योग के प्रभाव व उपाय

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आंशिक कालसर्प योग के प्रभाव व उपाय

जन्म कुंडली में जब सभी ग्रह राहु केतु के एक ओर हो तो कालसर्प योग बनता है। यदि राहु केतु की परिधि से एक ग्रह बाहर हो तो अांशिक कालसर्प योग बनता है। ये दोनों ही परिस्थितियाँ व्यक्ति के लिए कष्टकारक होती हैं। राहु व केतु अनिष्ट फलदायक ग्रह हैं तथा छाया ग्रह होने के कारण इनका विपरीत परिणाम कब भोगना पड़ेगा, यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। यदि जन्मकुंडली में कालसर्प योग है और उसके लिए उपयुक्त उपाय नहीं अपनाये जाते तो व्यक्ति को आजीवन अन्य ग्रहों का पूर्ण प्रभाव प्राप्त नहीं होता । निरन्तर संघर्ष करने के बावजूद भी व्यक्ति अपने महत्वपूर्ण लक्ष्यों को प्राप्त नही कर पाता है ।

आंशिक कालसर्प योग के प्रभाव व उपाय

कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्ति का जीवन संघर्षपूर्ण रहता है। कालसर्प योग के अनिष्ट प्रभावों को दूर करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाने की आवश्यकता होती है। आपकी जन्मकुंडली में कालसर्प योग है या नहीं और यदि है तो कालसर्प योग के अनिष्ट प्रभावों का निवारण
करने के लिए आपको क्या-क्या उपाय अपनाने चाहिए इसकी जानकारी आपके लिए आवश्यक है।

आर्छिाक कालसर्प योग-
यदि जन्मकुंडली में राहु केतु की परिधि से एक ग्रह बाहर हो तो अांशिक कालसर्प योग बनता है। यह भी कालसर्प योग के समान ही दुश्प्रभाव देने वाला योग है। इसके अतिरिक्त इस योग में जो भी ग्रह कालसर्प की परिधि से बाहर होता है जीवन में अधिक मिलते हैं।

यदि जन्मपत्री में शनि ग्रह कालसर्प की परिधि से बाहर है तो शनि ग्रह के अधिक दुश्प्रभाव देने वाला आशिक कालसर्प योग बनता है। शनि ग्रह सामान्यतया जीवन में व्यक्तियों से मित्रता, क्रूर कर्म तथा कठोर मेहनत का कारक होता है। कालसर्प योग से शनि ग्रह बाहर होने के कारण आपको जीवन में शनि ग्रह से संबंधित अशुभ फल अधिक मिलने की संभावना रहेगी। इसके प्रभाव से आपको महत्वपूर्ण कार्यों के अन्तिम चरण में असफलता, निराशा जीवन के प्रति उदासीनता, चिन्ता व वैराग्य की भावना, दीर्ध अवधि के रोग, मानसिक प्रति अनास्था, पैतृक सम्पति व अच्छे वाहनों से हानि, कब्ज का रोग, जोड़ों के दर्द, मुकदमे में हार, कान में दर्द या अन्य रोग या बहरापन आदि से शक्तियों का सदुपयोग करने में असमर्थ रहेंगे। इन सब दुश्प्रभावों को दूर करने के लिए आपको कालसर्प शांति के उपाय अवश्य करने चाहिए।
आंशिक कालसर्प योग को अब एक उदाहरण द्वारा समझते हैं।


janam kundli kaal sarp dosh

ऊपर दी गई जन्मपत्री में शनि के अतिरिक्त सभी ग्रह राहु केतु के एक ओर स्थित हैं। राहु की स्थिति द्वादश भाव में है। इसलिए इस जन्मपत्री में शेषनाग नामक कालसर्प योग हे | इसके दुश्प्रभाव के कारण व्यक्ति के अनेक गुप्त शत्रु होते हैं। जीवन में प्राय: लड़ाई झगड़े का सामना करना पड़ता है। विजयी होने के पश्चात् भी अन्ततः पराजय को इोलना पड़ता है। अiखों के कष्ट होते हैं । सिर के पिछले भाग में चोट लगने का भय रहता है | यह दुर्योग व्यक्ति को चिन्तायें अधिक देता है।

कालत्सर्प शांति के उपाय-
1. कालसर्प योग के दुश्प्रभावों को दूर करने के लिए सबसे श्रेष्ठ उपाय श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को कालसर्प शाति यज्ञ मे भाग लेना है । विधिवत् कालसर्प शांति पूजा के द्वारा आप इस दुर्योग के अशुभ परिणामों से हमेशा के लिए बच सकते हैं। इस महायज्ञ में भाग लेने के लिए हमारे कार्यालय में फोन द्वारा सम्पक करके आप तिथि व समय आदि की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। वर्ष 2017 में यह पूजा शुक्रवार 28 जुलाई को सम्पन्न होगी।
2. हर रोज प्रातः एक माला सर्प गायत्री मंत्र का जाप करें।
सर्प गायत्री मंत्र है-
''ऊँ नवकुल नागाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।'
3. भगवान शिव के मंत्र "ऊँ नम: शिवाय:' अथवा महामृत्युंजय मंत्र का प्रतिदिन एक माला जप करें।
4. घर में पारद शिवलिंग और कालसर्प यंत्र की स्थापना करें।
5. हर वर्ष नागपंचमी की दिन व्रत करें सपों की पूजा करें और उनके लिए दूध आदि हेतु सपेरों को दक्षिणा दे |
6. भगवान कृष्ण की पूजा करें। घर में मोर पंख लगायें ।

7. धातु के बने 108 नाग-नागिन जल में प्रवाहित करें।
8. पक्षियों को जो डालें या बहते जल में जो प्रवाहित करें।
9. गले में रुद्राक्ष व सीप से निर्मित विशेष कालसर्प शांति माला धारण करें।
10. कालसर्प शांति लॉकट धारण करें | कालसर्प यंत्र के नीचे गोमेद व लहसुनिया लगवाकर नवनाग मंत्र से सिद्ध करें तथा इसे अपने गले में धारण करें। इससे आपको इस दुर्योग के दुश्प्रभाव से शांति मिलेगी। यह सवधिक लाभदायक तथा शांति प्रदान करने वाला उपाय है।

नितिन कुमार पामिस्ट


मांगलिक दोष के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय

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मांगलिक दोष के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय

यदि जन्मपत्री में मंगल लग्न से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में स्थित हो तो मांगलिक दोष माना जाता है। वर वधू की जन्म-कुंडली का मिलान करते समय गुण मिलान के साथ-साथ मांगलिक मिलान का भी महत्व होता है। मंगल नैसर्गिक रूप से क्रूर स्वभाव वाला ग्रह है इसलिए जन्म-कुंडली के कुछ भावों में इसकी स्थिति पारिवारिक संबंधों के लिए कष्टकारक मानी जाती है।


कुछ परिस्थितियों में मंगल दोष का परिहार भी माना जाता है। ये राशि या उच्च राशि अर्थात् मेष, वृश्चिक या मकर में स्थित होना, मंगल के साथ बृहस्पति या चन्द्र की युति होना, मंगल का शुभ ग्रहों से युक्त होना, केन्द्र या त्रिकोण में गुरू ग्रह स्थित होना, आदि। कुछ ज्योतिर्विदों का मानना है कि जातक की आयु 28 वर्ष होने के पश्चात् मंगल दोष निशप्रभावी हो जाता है।

यद्यपि इस दोष के दुष्प्रभाव को कम अांकने के लिए अनेक सरल मार्ग प्रचलित हैं तो भी सभी जातक किसी विशेष आयु में परिपक्व नहीं हो जाते और न ही जन्मपत्री के अन्य योग मांगलिक दोष के दुश्प्रभाव को समाप्त कर सकते हैं। अत: मांगलिक मिलान में अत्यन्त सावधानी की आवश्यकता होती है। हमारे अनुभव के आधार पर यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुडली में मांगलिक दोष है तो उसका प्रभाव अवश्य होता है।

मांगलिक दोष प्राय: चन्द्र लग्न से भी देखा जाता है। इसकी गणना भी ठीक उसी प्रकार की जाती है जिस प्रकार लग्न से मांगलिक दोष देखा जाता है। चन्द्र लग्न से मांगलिक दोष का प्रभाव बहुत ही कम होता है तथा अधिकांश ज्योतिषी इसे प्रभावहीन ही मानते हैं। इसका महत्व केवल उस स्थिति में ही हो सकता है जब वर-वधू की कुण्डली मिलाते समय एक की कुण्डली में मांगलिक दोष विद्यमान हो और दूसरे की कुण्डली में न हो। ऐसी स्थिति में यदि दूसरी कुण्डली में चन्द्र से मांगलिक योग है तो ज्योतिषी इस योग को अांशिक मांगलिक दोष मानते हुए मांगलिक मिलान मान लेते हैं। कहीं कहीं इसी प्रकार से शुक्र को लग्न मानकर मांगलिक दोष देखने की प्रथा भी है।

आधार पर हम सभी को यह स्पष्ट राय देते हैं कि यदि जन्मकुण्डली में लग्न से मांगलिक दोष है तो उसे महत्व दिया जाना चाहिए परन्तु यदि मांगलिक दोष लग्न से न होकर चन्द्र या शुक्र से हो तो उसे केवल अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए मांगलिक दोष माना जा सकता है। यह मांगलिक दोष व्यावहारिक नहीं है।

जन्मपत्री में मांगलिक दोष-
यदि आपकी जन्मकुंडली में मंगल ग्रह की स्थिति लग्न चतुर्थं, सप्तम्, अष्टम या द्वादश भाव में है तो इसके प्रभाव से आपकी वाणी कठोर तथा स्वाभाव क्रूर व चिड़चिड़ा हो सकता है। पारिवारिक जीवन में अशांति व तनाव संभव है। जीवन साथी के स्वास्थ्य के लिए भी यह स्थिति कष्टकारक है। यदि आपके जीवन साथी की कुडली में भी मांगलिक योग है तो स्थिति बेहतर हो सकती है। अन्यथा आपको इस सम्बन्ध में आवश्यक उपाय व सावधानियों की आवश्यकता रहेगी |

मांगलिक दोष निवारण के उपाय -
यदि किसी कारणवश आप मांगलिक दोष से पीड़ित हैं और आप इसके निवारण के लिए उपयुक्त उपाय लाभदायक उपाय इस प्रकार हैं-
1. विवाह पूर्व मंगल ग्रह के मंत्र का 108 माला जप करें तथा विवाह की दिन मंगल मंत्र से दशमांश आहुति दें। अगर यह संभव न हो पाए तो विवाह के दिन मंगल मंत्र से 108 आहुति दें। मंगल ग्रह का मंत्र है–‘उळै क्रां क्रीं क्रीं सः भीमाय नमः ।।'
2. मंगल ग्रह से संबंधित वस्तुओं का मंगलवार को प्रातःकाल ब्राह्मण को दान दे तथा संकल्प करवायें ।
3. यदि कन्या मंगली है और वर मंगली नहीं है तो वास्तविक फेरों से पहले कन्या के फेरे केले के पेड़, कलश या विष्णु भगवान की मूर्ति के साथ करने चाहिए।
4. यदि वर मंगली है और कन्या मंगली नहीं है तो वास्तविक फरों से पहले वर के फेरे तुलसी के पौधे के साथ करवाने चाहिए। 5. मंगलवार को शिवलिंग पर जल चढ़ायें।
5 . मंगलवार को शिवलिंग पर जल चढाय ।
6. आटे के पेड़े में गुड़ व चीनी मिलाकर 7 मंगलवार को गाय को खिलायें।
7. मंगलवार की मोठी रोटियों तन्दूर में लगवाकर बीटें।
8. मंगलवार को रेवड़िया पानी में बहायें ।
9. बन्दरों को मंगलवार को मीठी शक्करपारे आदि खिलाये |
10. हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का प्रतिदिन पाठ करें।
11. मंगलवार को व्रत करें। विधिवत् नमक का खाना खाएं।
12. मंगला गौरी व्रत, वट सावित्री व्रत, कार्तिकेय जी की पूजा तथा प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ होती है।

मगल दोष का विशेष उपाय -
विवाह के समय कुंडली मिलान करते समय वर-वधू की कुडली में मांगलिक दोष का मिलान किया जाता है। यदि कन्या का मंगल वर के मंगल से अधिक बली हो तो कन्या का विवाह एक कलश से किये जाने की परम्परा है। विवाह के पश्चात मिट्टी के बने उस कलश को फोड कर नदी में डाल दिया जाता है या कलश को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसका प्रभाव यह माना जाता है कि मंगल दोष का अशुभ प्रभाव टल गया । कन्या का विवाह कई स्थानों पर वट वृक्ष की लष्कडी के साथ कराये जाने का भी प्रावधान है। दक्षिण भारत में ऐसी कन्याओं का विवाह केले के तने के साथ किया जाता है। कन्या का विवाह विष्णु जी की मूर्ति के साथ करवाने का विधान भी मिलता है। इन सब कार्यक्रमों का उददेश्य कन्या के वास्तविक वैवाहिक जीवन में सुख, शांति व समृद्धि लाना होता है। मंगल यंत्र की पूजा व मंगल कवच धारण करना भी एक लाभदायक उपाय है। प्रबल मांगलिक दोष वाली कन्याओं के सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए उन्हें वष्ट सावित्री व्रत या मंगला गौरी व्रत करने की सलाह भी दी जाती है। विवाह के पश्चात् सुन्दर कांड का पाठ करने से । शांति बनी रहती है।

नितिन कुमार पामिस्ट



पितृदोष प्रेतबाधा व तंत्र बाधा से मुक्ति पाए

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पितृदोष प्रेतबाधा व तंत्र बाधा दोष के लाभदायक उपाय

पितृदोष प्रेतबाधा व तंत्र बाधा दोष के लाभदायक उपाय


प्राय: कुछ व्यक्तियों का जीवन काफी शांतिपूर्ण, समृद्ध तथा प्रगतिशील होता है जबकि कुछ अन्य अपने जीवन को अनेक कष्टों व समस्याओं से युक्त पाते हैं। कुछ व्यक्तियों की समस्याएं एक दो असान उपाय अपनाने से समाप्त हो जाती हैं जबकि कुछ अन्य व्यक्तियों को उन्हीं उपायों से कुछ भी लाभ नहीं मिलता। जन्मपत्री में कुछ समस्याओं के कारण प्रत्यक्ष दिखाई कोई भी कारण स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता । फिर भी व्यक्ति अत्यन्त परेशान ही रहता है। प्रेत बाधा दोष व पितृ दोष भी ऐसी ही समस्याएं हैं जिनकी कई बार जन्मपत्री में स्पष्ट उपस्थिति दिखाई नहीं देती । फिर भी व्यक्ति को परिवार में अशांति, व्यवसाय में निरन्तर धन-हानि, असाध्य रोगों से ग्रसित होना, संतान न होना या संतान से संतुष्टि न होना, संतान से कष्ट मिलना, शिक्षा में अचानक रूचि समाप्त हो जाना, स्वास्थ्य निरन्तर खराब रहना व निराशा को कारण मानसिक स्थिति ख़राब होना आदि जैसी समस्याओ का आजीवन सामना करते रहना पड़ता है।

पितृदोष का सीधा अर्थ है पिता या पूर्वजों के अधूरे या अशुभ कायों का दुश्प्रभाव जो जातक को निरन्तर असफलता, विध्न व मुसीबतें देता है। पितृ दोष के अन्तर्गत केवल पिता ही नहीं बल्कि अन्य सगे सम्बन्धी भी आते हैं। मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति के शरीर को जलाकर या अन्य प्रकार से समाप्त कर दिया जाता है | शरीर से सूक्ष्म आत्मा अथवा प्राण निकल जाने पर ही शरीर को मृत माना जाता है।

मान्यता है कि दूसरा शरीर धारण करने तक यह अत्मा भटकती रहती है। यह अवधि घन्टों, दिनों महीनों या वर्षों में हो सकती है। अपने सगे संबंधियों से पूर्ण सम्मान न मिलने पर यह भटकती हुई आत्मा उन्हें कष्ट देने की स्थिति में होती है।

तंत्र बाधा का अर्थ है तांत्रिक विधि से अदृश्य शक्तियों के माध्यम से दूसरों को कष्ट देना। जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम गोत्र राशिः नक्षत्र आदि के आधार पर तांत्रिक विधि से अभिचार कर्म करता है तो उस व्यक्ति को अनायास कष्ट मिलने लगते हैं।

प्राय: इन अभिचार कर्मों के बारे में संबंधित व्यक्ति को तत्काल जानकारी नहीं मिल पाती और वह इनका उपचार नहीं कर पाता। जब उसकी समस्याएं बहुत ही बढ़ जाती हैं और उसे इन सबका कोई स्पष्ट कारण भी दिखाई नहीं देता तभी उस व्यक्ति का ध्यान तंत्र बाधा के कारण होने वाली अकारण परेशानियों को दूर करने के लिए जाता है।

पितृदोष, प्रेत बाधा दोष व तंत्र बाधा की स्थिति किसी जन्म पत्री में ही सकती है या नहीं, इस संबंध में ज्योतिष शास्त्र में अनेक ग्रह स्थितियों का विवरण दिया गया है। यहां हम संक्षेप में इस संबंध में विवरण दे रहे हैं-

1. सूर्य, चन्द्रमा या लग्न—लग्नेश पर राहु केतु या शनि का युति अथवा दृष्टि द्वारा प्रभाव |
2. लग्नेश व अष्टमेश में परिवर्तन की स्थिति ।
3 पंचमेश व अष्टमेश में परिवर्तन को स्थिति ।
4. सूर्य की पंचम में तुला राशि में स्थिति तथा उस पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव |
5. राहु केतु का गुरू या मंगल के साथ संबंध आदि ।

यदि आपकी जन्मपत्री में इस बात के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि आप पितृदोष से पीड़ित हैं तो इस संबंध मे आपको जो उपाय करने चाहिए वे इस प्रकार हैं-

1. शनिवार के दिन कच्चा दूध तथा काले तिल नियमित रूप से पीपल के वृक्ष पर चढ़ायें। इससे पितृदोष का प्रभाव कम हो जाएगा।

2. गाय पालने, धर्म स्थान की नियमितं सफाई करने, इष्ट देव की नित्य पूजा करने कुत्ते को नियमित रूप से रोटी खिलाने अपने घर में यज्ञ अनुष्ठान करने, भिखारी को भोजन कराने व पशु पक्षियों के लिए जल तथा भोजन का इन्तजाम करने से भी विभिन्न प्रकार के पितृदोष समाप्त या कम हो जाते हैं।

इस उपाय को भी आप सरलतापूर्वक अपना सकते हैं।

3. पितृदोष व प्रेतबाधा दोष के कारण होने वाली विभिन्न परेशानियों को दूर करने के लिए आप आगे दिये गये उपाय को विधिपूर्वक पूर्ण करें। सवा दो किलो बाजरे का दलिया बनायें। इसमें गुड़ मिलाकर इसे मीठा करें। मिट्टी की हांडी में इसे डाल लें । इसे तंत्र बाधा, प्रेत बाधा से पीड़ित व्यक्ति के उपर से सात बार उतार लें। अब इसे चुपचाप जाकर किसी चौराहे पर रख दें और सीधे अपने घर वापिस चले जाएं। ध्यान रहे जाते हुए व आते हुए न तो किसी व्यक्ति से बात करें और न ही पीछे मुड़कर देखें या किसी स्थान पर रूकें। यह क्रिया आप शनिवार को सायंकाल के समय करें। निश्चित लाभ मिलेगा।

नितिन कुमार पामिस्ट 
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