Monday, March 20, 2017



हाथ कौन सा देखे? (Which Hand To Read Palmistry)

हाथ कौन सा देखे ?


हमारे मस्तिस्क में ये सवाल सबसे पहले आता है की हमको व्यक्ति का कौन सा हाथ देखकर फलादेश करना चाहिए, सीधा या उल्टा हाथ ?


कुछ विद्वानों का मत है की स्त्रियो और बच्चो का उल्टा हाथ और पुरषों का सीधा हाथ देखना चाहिए !कुछ विद्वानों का मत है की कामकाज करने वाली महिलायों का भी सीधा हाथ ही देखना चाहिए व उन पुरुषो का बाया हाथ देखना चाहिए जो आत्मनिर्भर नहीं होते !कुछ विद्वानों का मत है की जिस हाथ से व्यक्ति काम करता है या व्यक्ति जिस हाथ को ज्यादा उपयोग में लाता है उस हाथ को देख कर ही फलादेश करना चाहिए !

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इस विषय पर विद्वानों का मत अलग-अलग है ! हस्तरेखा शास्त्री को दोनों ही हाथो की रेखाओ को बराबर का महत्व देना चाहिए ! व्यक्ति के जीवन में आये उतार चढाव का फलादेश कर के पता करे की आपकी बात किस हाथ से सटीक मिल रही है, उसी हाथ को प्राथमिकता दे ! एक अच्छे हस्तरेखा शास्त्री को चाहिए की वो दोनों ही हाथो का निरिक्षण करने के पश्चात ही फलादेश करे |

- नितिन कुमार

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फलित ज्योतिष - ASTROLOGY



भारतीय ज्योतिष फलित का आधार ग्रह, राशियां तथा भाव है। इसलिये ग्रहों, राशियों तथा भावों की संज्ञाओं का ज्ञान आवश्यक हो जाता है। भारतीय ज्योतिष में सात ग्रह तथा दो छाया ग्रहों को स्थान प्राप्त है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि सात ग्रह हैं तथा राहु केतु छाया ग्रह हैं।

ग्रहों के गुण धर्म

सूर्य–ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य पित प्रकृति, लम्बा, अल्प बाल, कूर ग्रह, ताबे जैसा रंग, राजसी, दार्शनिक, पूंजी उधार देनेवाला, दृढ़ इच्छा शक्ति, पद का प्रतीक है।

ईंधन, बिजली, चर्म ऊन सूखा अनाज, सोना, विष, औषधियाँ, चिकित्सक, राजा अधिकारी वर्ग तथा गेहू सूर्य के अधीन है। सूर्य बीजों का विकास करता है। सूर्य पिता का प्रतीक है। यह ब्रह्माण्ड की आत्मा, रागों से बचाने की शक्ति, शेर तथा भगवान शिव का भक्त है। कांटों वाले पेड़, स्वर्ण राजदूत, नेत्र का प्रतीक है। पुरुष ग्रह है।

सूर्य के द्वारा शासित स्थान है- खुले स्थान, पर्वत, वन प्रमुख शहर, पूजा के स्थान, न्यायालय, पूर्व दिशा, ऐसा स्थान जहां पानी न हो।

शरीर के जो भाग शासित हैं- सिर, पेट, हड्डियां, हृदय, नेत्र, मस्तिष्क।

सूर्य क द्वारा रोग- उच्चरक्त चाप, तीव्रज्वर, पेट तथा नेत्र संबंधी रोग, पितज बिमारियां तथा हृदय रोग देता है। जब सूर्य पीड़ित होता है तथा जलीय राशियों में स्थित होता है तो क्षय रोग, पेचिश रोग देता है। यह क्षत्रीय वर्ण, अग्नि तत्व, पुरुष लिंग तथा पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह है।

चन्द्रमा- इसका शरीर स्थूल है। धुंघराले बाल, गोरा रंग तथा सुंदर आंखों का प्रतीक है। चन्द्रमा मन, माता, भ्रमण की रूची, रस, अस्थिर मन का कारक ग्रह है। रक्त प्रवाह का प्रतीक है। जलीय तत्व, झील, समुद्र, नदियां, कपड़ा, है।

शरीर को अंग– रक्त, नसे, मोटापा, मस्तिष्क, मन, यूरेटर, वास्ती, छाती, अंडाशय तथा प्रजनन का कारक ग्रह है।

रोग- रतिज रोग (Sexual diseases) सांस की बिमारी, त्वचा की बिमारियां, अपच मन्दाग्नि आदि विमारियों का कारक ग्रह है। यह कफ तथा वायु का कारक ग्रह है। यह वैश्य, वर्ण, जलीय तत्व, स्त्रीलिंग तथा उत्तर-पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह है।

मंगल- वलिष्ठ बाजु पतली कमर धुंघराले तथा चमकीले बाल, अग्निमय आंखें, क्रूर प्रकृति, अस्थिर बुद्धि का कारक ग्रह है। यह स्वतन्त्र प्रकृति, दुराग्रही, साहसी युवा ग्रह है। मंगल को अशुभ ग्रह कहते हैं। यह छोटे भाई, बुनाई को दर्शाता है। मंगल सेनाध्यक्ष है गर्म तथा अग्नि भय है, तर्क, रसोई, इंजन, अग्नि स्थलों का प्रतिनिधि है। रात्रि में काम कर वाले कर्मचारी, हत्या करने वाले, षडयन्त्र, शत्रु मजदूरों का नेता, का कारक ग्रह है।

पदार्थ- तांबा, धातु सोना, मूंगा, हथियार, भूमि, तम्बाकू, पर शासन करता है।

शरीर को अंग- रक्त, पेशी, पित्त, मस्तिष्क, सिर, नाक, कान आदि |

रोग- रक्त संबंधी रोग, उच्च या निम्न रक्तचाप, रक्तस्राव, दुर्घटनाएं, चोरियों, अग्नि से जलना, गर्भपात आदि। इसका क्षत्रिय वर्ण, पुरुष लिंग, अग्नि तत्व, दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह है।

बुध - बुध यदि शुभ ग्रहों के साथ संबंधित हो तो शुभ, अशुभ ग्रहों के साथ संबंधित हो तो अशुभ होता है। इसका अपना कोई प्रभाव नहीं होता जिसके साथ होता है वैसा ही हो जाता है। बुध हास्य विनोद का प्रतिनिधि ग्रह है। बहुत बोलता है। उसके पास विविध विषयों पर बहुत सारी सूचनाएं होती हैं। यह राजकुमार है। यह मितव्ययी, हरे वर्ण का पतला, व्यापारिक प्रकृति वाला, जनता की बात बोलने वाला। यह कामर्स, स्कूल, खेल का मैदान, पार्क, जुआघर, बरबादी कर खुश होने वाला ग्रह है।

वस्तुए लेखन प्रतिभा व्यापारी का प्रतिनिधि है।

शरीर को अंग रोग उन्माद, एवं गूंगापन। यह वैश्य वर्ण, नपुंसक, सम तत्व तथा उत्तर दिशा का प्रतिनिधि है |

बृहस्पति - इसकी आंखे तथा बाल भूरे कद लम्बा होता है। पेट आगे निकला होता है। यह स्थूलकाय ऊँची और भारी आवाज का स्वामी होता है। वह पुरुष वत्। शुभ, पीला रंग, पुरुष ग्रह है। सच्चाई, दार्शनिक प्रत्येक प्रकार के विज्ञान में रुचि रखने वाला धार्मिक भावभक्ति वादी ग्रह है। विवेक का मूल ग्रह है। यह धर्म गुरु ग्रह है। मन्त्री, सलाहकार, बैंक बीमा कम्पनियां, आकाश, तत्व, धर्म गन्थ और पारे का प्रतिनिधि है। पुत्र का कारक है।

वस्तुएं- धन, बैंक, पीली वस्तुएं सोना, पुखराज, चने की दाल, धार्मिक ग्रन्थ का कारक ग्रह है।

शरीर को अंग विवेक, शक्ति, उदर, जिगर, जंघा का कारक है।

रोग रोग - वसा को द्वारा उत्पन्न रोग | यह ब्राह्मण वर्ण, पुरुष लिंग, अग्नि तत्व तथा उत्तर-पूर्व दिशा का प्रतिनिधि है। शुक्र चेहरा, नक्श का प्रतिनिधि है। शुक्राणुओं का कारक ग्रह है तथा रति का शौकिन है | प्रेम सम्बन्ध आकर्षण व्यक्तित्व का स्वामी है | जालीय तत्व, पत्नी, सिल्क, संगीत का कारक है।

वस्तुएं इत्र, सजावट की वस्तुएं, सिल्क संगीत वाद्य यंत्र, ऐश्वर्य के साधन वाहन का प्रतीक है। मीठी वस्तुएं शरीर के अंग- रति क्रिया के अंग लिंग, मूलाशय, बाल, शुक्र कीटाणु, सूघने की शक्ति कम, श्वेत प्रदर, वीर्य पात आदि। यह ब्राह्मण वर्ण, जलतत्व स्त्री लिंग तथा दक्षिण पूर्व का प्रतिनिधि है।

शानि जातक रूखे-सूखे बाल, लम्बे बड़े अंग, बड़े दांत तथा वृद्ध शरीर काला रंग का दिखता है। यह अशुभ ग्रह है। मन्द गति ग्रह है। नैतिक पतन का द्योतक है। वायु सम्बन्धि बिमारियों का प्रतिनिधि है। यह दुख, निराशा तथा जुए का प्रतीक है। गन्दे स्थान, अंधेरे स्थानों का कारक ग्रह है।

रोग- सारे, पुराने, लाइलाज रोग, दांत, सांस, क्षय, वातज, गुदा के रोग, व्रण, जख्म दर्द जोड़ों का यह शूद्र वर्ण, वायु तत्व, नपुंसक तथा पश्चिमी स्वामी है।

राहु यह छाया ग्रह है परन्तु प्राणियों पर इसका पूरा प्रभाव रहता है। यह अशुभ ग्रह है। स्त्रियोचित है। भ्रष्ट संक्रामक रोगों का प्रतीक है।

यह शनि की ही तरह अशुभ है। यह स्त्रीलिंग ग्रह है। यह विदेश यात्रा का प्रतीक है। यह भौतिक वादी ग्रह है। यह षडयन्त्र कारी है। त्वचा तथा रक्त रोगों पर इसका अधिपत्य है। गोमेद इसका रत्न है।

शरीर के अंग- होठ, त्वचा, रक्तरोग, कुष्ठ रोग, श्वेत रोग, चैचक हैजा

केतु यह मंगल के समान ग्रह है। अचानक होने वाली घटनाओं का कारक है। इसका रंग धुएँ के समान चितकबरा रंग है।

यह आंत्रिक जोड़ो, चैचक, हैजा तथा संक्रांमक रोगों का प्रतिनिधि ग्रह है। यह अशुभ ग्रह है पर धार्मिक प्रकृति का ग्रह है। साम्प्रदायिक कट्टर पन्थी, घमंडी स्वार्थी तथा तंत्र विद्या का प्रतिनिधि ग्रह है।

यह भी राहु की तरह दक्षिण पश्चिम दिशा का स्वामी है। लहसुनिया इसका रत्न है।


ज्योतिष में राशियों और नवग्रहों के रोग - ASTROLOGY


ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में कालरूपी पुरुष के शरीरके विविध अंगों मे मेष से लेकर मीन तक बारह राशियो की स्थापना की गयी है, जिसके आधार पर उसके अंग रोगग्रस्त या स्वस्थ हैं, यह जाना जा सकता है ज्योतिषशास्त्र की मान्यता के अनुसार मेष राशि-सिर , वृष राशि - मुख , मिथुन - भुजा , कर्क-हृद्य , सिंह - पेट , कन्या-कमर , तुला-वस्ति, वृश्चिक-गुप्तांग, धनु-ऊरू, मकर-घुटने, कुम्भ-जंघा तथा मीन राशि पैरो का प्रतिनिधित्व करती है।

राशिया
मेष आदि बारह राशियाँ स्वभावत: जिन-जिन रोगो को उत्पन्न करती हैं, वे रोग इस प्रकार हैं.
मेष-नेत्ररोग, मुखरोग, सिरदर्ट, मानसिक तनाव तथा अनिद्रा
बृष-गले एवं श्वासनलीके रोग, ऑख, नाक एवं गलेके रोग
मिथुन-रक्तविकार, श्वास, फुफ्फुस रोग
कर्क-हृदयरोग तथा रक्तविकार
सिहं-पेट रोग तथा वायुविकार
कन्या - आमाशय के विकार, अपच, जिगर और क्रमरदर्द
तुला - मूत्राशयके रोग, मधुमेह, प्रदर एबं बहुमूत्र
वृश्चिक-गुप्तरोग, अगन्दर, संसर्गजन्यरोग
मकर – वातरोग, चर्मरोग, शीतरोग, रक्तचाप
कुम्भ-मानसिकरोग, ऐंठन, गर्मी, जलोदर
मीन - एलजीं, गठिया, चर्मरोग एबं रक्तविकार
नवग्रह
सभी पापग्रह रोगोंको उत्पन्न करते हैं, यदि ये शुभ स्थिति में न हो तो भी रोगोंको देते हैं।

सूर्य के रोग - आंखोकी रोशनि कम होना , अंधापन सिर तथा नेत्रपीड़ा , ज्वर, अतिसार, क्षय, पित्तविकार, अग्नि या आग्नेय शस्त्र तथा लकड़ी से पीड़ा करता है।
हदय तथा पेट मे रोग, शत्रु से भय कराता है। चर्मरोग,अस्थिभंग, स्त्री-पुत्रहानि, पशु-राजा और चोरसे हानि, देवता-ब्राह्मणभुत तथा सर्पसे भय उत्पन्न करता है।
अपमान, पठावन्ननि, जीवनशक्तिका हास, चिडचिडा होना आदि ।

चंद्रमा के रोग - चंद्रमा कमज़ोर हो तो निद्रा न आना, अत्यधिक नींद आना, नींद में चलना, नींद से संभंधित रोग, फोड़ा, बदहजमी, ठम्न, स्त्री या स्वीटेवता से पीड़ा शीतज्वर, रक्तविकार, खूनकी कमी, रक्तनसम्बन्धी सञ्चमी बीमारी, जलतन्तु, जलटशावाले पशु से पीडा, जलमें डूबना, सींगवाले पशुओं से पीडा आदि।

मंगल के रोग - मंगल पापदृष्ट या पीड़ित हो तो मांस , मज्जादोष (सूखारोग), रक्तकोप (रक्तमें खराबी), ज्वर, पित्तदोष, क्षत्रियोंसे पीडा, राज्याधिकारी से पीड़ा, अंगुलिया सूजना, निष्ठुरता वायुगोला, आईसे क्लेश, शत्रु चोरसे पीड़ा, बायें कानके रोग, टायफाइड, मूत्रपिण्डमें तकलीफ , माता निकलना, पथरी एवं गुर्दोंके रोग आदि होने हैं।

बुध के रोग - यदि बुध पापग्रह से युक्त या पापग्रहसे दृष्ट हो तो भ्रम, शंकाकी आदत, सन्तिपात-ज्वर, दुष्ट सपने आना, संग्रहणी, पेचिश तथा अतिसार आदि रोग होते हैं।

गुरु के रोग – गुरु यदि पापयुक्त या पापदृष्ट हो तो आँतके रोग, मूछ आना, दिमाग सुन्न हो जाना, शोक - विलाप, किसी अंगमें सूजन, रक्तसंचरणसम्बन्धी रोग, खूनका थक्का जमना, मोटापा, वमनपीडा , कर्णपीड़ा,गुरु या ब्राह्मणका शाप, लीवरके दोष, पीलिया तथा मधुमेह आदि।

शुक्र के रोग - यदि शुक्र पापदृष्ट या इससे युक्त हो तो प्रमेह, बहुमूत्रपीड़ा, पेशाब रुकना,प्रदररोग, मूत्रमें जलन, मूत्र रुकरुककर आना, गुर्द ठीकसे काम न करना, नेत्ररोग, शरीर पीला पड़ना,गुप्तांगरोग, अत्यधिक कामपीड़ा (व्यभिचार) दुष्ट स्त्रीयोंकी संगति, नपुंसकत्व गर्भाशय-सम्बन्धीरोग,गलेके रोग, चकत्ते होना, गले और स्तनके रोग,श्वारोग, दमा, श्वेत कुष्ठ, दमेसे सांस फूलना इत्यादि रोग।

शनि के रोग - शनि पापदृष्ट या इससे युक्त हो तो बहुत पीड़ादायक, बहुत ज्यादा बहकना, पैर दुखना, पिण्डलियाँ दुखना, जोडों तथा घुटनोंमें दर्द, हृदयमें ताप, हाई-लो ब्लडप्रेसर, दाँतके रोग, दरिद्रता, आलस्य, लकवा, कोई भी दीर्घ अवधिक रोग, भूख अधिक लगना, नस-नाडियोंके रोग, जांघ -पिण्डलीके रोग इत्यादि।

राहु के रोग – यदि राहु पापदुष्ट हो तो कुष्ठरोग, हृदयरोग, भूतबाधा, स्मरणशक्ति कमजोर होना, भूख-प्याससे सम्बन्धित बीमारी, छोटी माना (खसरा), पेट में कीड़े, बन्धन (हथकडी रस्सीसे बंधना) आदि होते हैं।

केतु के रोग-यदि केतु पापदुष्ट हो तो सारे शरीरमें खुजली चलना, चित्ती निकलना, प्रेतपीड़ा, दस्त बन्द हो जाना, तान्त्रिकपीडा आठी।


कुण्डली एवं भाव परिचय - ASTROLOGY

ज्योतिष - ASTROLOGY

जन्मपत्री किसी निश्चित स्थान पर किसी निश्चित समय के लिए आकाश का नक्शा होती है उस समय जो भचक्र की राशि पूर्व क्षितिज पर उदय होती है उसका संकेत करती है जिसे लग्न की संज्ञा दी जाती है इसे प्रथम भाव के नाम से भी जाना जाता है।
जन्मपत्री के रूपः
भारत के विभिन्न भागों में जन्मपत्री को विभिन्न रूपों से चित्रित किया जाता है जिनमें उत्तर भारतीय दक्षीण भारतीय और बंगाल विधि अधिक प्रचलित है।
चित्र नं 1 भारत के उत्तरी भाग में इसका प्रयोग किया जाता है।

सबसे ऊपर मध्य भाग को लग्न अथवा प्रथम भाव की उदयीमान राशि माना जाता है और जन्म समय उदय होने वाली राशि की संख्या जैसे- उदाहरण कुण्डली में सिंह राशि के लिए 5 संख्या को लग्न में लिखा जाता है तदुपरान्त भावों की गिनती घड़ी की विपरित चाल से क्रमशः की जाती है। और राशियों के इसी क्रम में अगले भावों में क्रमशः लिखा जाता है जैसे- कि चित्र नं. 1 में दिखाया गया है।


भारत के दक्षिणी भाग में इस प्रचलित जन्मपत्री रूप चित्र नं. 2 के अनुसार है इस रूप में राशियों की स्थिति भावों में स्थिर रखी जाती हैं और जैसा कि चित्र में दिखाया गया है और ऊपर के बायें हाथ के वर्ग मीन राशि लिखी जाती है और घड़ी की चाल के क्रम में मेष वृष मिथुन आदि राशियों शेष वर्गों में लिख दी जाती है और जो लग्न स्पष्ट राशि की उस राशि वर्ग में शब्दो से लिखा जाता है और उस पर लग्न को निशान भी लगा दिया जाता है उसके पश्चात् जन्मसमय ग्रह स्पष्ट सारणी से ग्रहों की जो स्थिति होती उसके अनुसार सम्बन्धित राशि में बैठा दिया जाता है।
चित्र नं. 3 में जन्मपत्री के रूप प्रयोग बंगाल और उसके पड़ोसी क्षेत्र में सामान्यतया किया जाता है। इस रूप में ऊपरी कोष्ठ में मेष राशि लिखी जाती है। और तदुपरान्त घड़ी की विपरीत चाल अनुसार क्रमश: कोष्ठो में वृष, मिथुन राशि आदि लिख दी जाती है जन्मसमय जो लग्न स्पष्ट राशि होती है, उसे उस राशि वर्ग में शब्दों में लिखा जाता है और उस पर लग्न का // निशान् भी लगा दिया जाता है इसके पश्चात् जन्म समय ग्रह स्पष्ट सारणी से 6हीं की जो स्थिति होती है उसके अनुसार सम्बन्धित राशि में बैठा दिया जाता है।

ब्रह्माण्ड को, कालपुरुष को जिस प्रकार 12 राशियों में बांटा गया है उसी प्रकार काल पुरुष को 12 भावों में भी बांटा गया है। भाव स्थिर है। प्रथम भाव को लग्न कहा जाता है।
जातक के जन्म के समय पूर्व में जो राशि उदित होती है उस राशि की संख्या को लग्न या प्रथम में लिखा जाता है। उसके बाद क्रमश: उदय होने वाली राशियों को द्वितीय, तृतीय भाव में लिखा जाता है। भाव पूर्व से उत्तर पश्चिम दिशा में चलते हैं, इसको विपरीत घड़ी गति भी कह सकते हैं।
वह ग्रह जो किसी भाव के कार्य को करता है उसे उस भाव का कारक ग्रह कहते हैं। भाव के कार्य को भाव का कारकत्व कहते है।
कारक ग्रह
1. प्रथम भाव - तनु भाव - सूर्य और चंद्र
2. द्वितीय भाव - धन भाव - बृहस्पति और बुध
3. तृतीय भाव - सहज भाव - मंगल और शनि
4. चतुर्थ भाव - सुख भाव - चन्द्रमा , बुध और शुक्र
5. पंचम भाव - पुत्र भाव - बृहस्पति
6. षष्ठ भाव -शत्रु भाव - मंगल , शनि और बुध
7. सप्तम भाव - कलत्र भाव - शुक्र
8. अष्टम भाव - आयु भाव - शनि
9. नवम भाव - धर्म, भाग्य, पितृ भाव - बृहस्पति और सूर्य
10. दशम भव - कर्म भाव - बुध, सूर्य, और बुध
11. एकादश भाव - लाभ भाव - बृहस्पति
12. द्वादशा भाव - व्यय भाव - शनि और शुक्र


अन्य ज्योतिष विद्वानों ने मत के अन्य कारक भी माने हैं जैसे- प्रथम भाव का कारक सूर्य के साथ चन्द्रमा भी है। द्वितीय भाव का कारक बुध वर्णा पटुता के कारण, तृतीय भाव का शनि-आयु कारक, चतुर्थ भाव का शुक्र-वाहन का कारक, षष्ठ भाव का बुध- मामा का कारक, दशम भाव का मंगल- पराक्रम, तकनीकी शिक्षा, प्रतियोगता का कारक तथा द्वादश भाव का शुक्र सम्भोग का कारक ग्रह भी माना है।
ग्रहों के कारकत्व ग्रहों को भी नैसर्गिक कुछ काम सौंपे गये हैं। उनका भी विचार करना आवश्यक है।
सूर्य - राजा, राजनीति, चिकित्सा विज्ञान गौरव, पराक्रम का कारण है।
चंद्र - मन, रुचि, सम्मान, निद्रा, प्रासन्नता, माता, सत्ता, धन, यात्रा, जल का कारक है।
मंगल- शक्ति, साहस, पराक्रम, प्रतियोगता, क्रोध, उत्तेजना, षडयन्त्र, शत्रु विपक्ष विवाद, शस्त्र, सेनाध्यक्ष, युद्ध दुर्घटना जलना, घाव, भूमि, अचल सम्पत्ति छोटा भाई , चाचा का लड़का, नेता, पुलिस , सर्जन, मकेनिकल इंजीनियर का कारक है ।
बुध - बुद्धिमत्ता वाणी पटुता तर्क अभिव्यक्ति शिक्षा गणित डाकिया , ज्योतिष, लेखाकार, व्यापार, कमीशन एजेंट, प्रकाशन राजनीति में मध्यवर्ती व्यक्ति (विचोला नृत्य, नाटक, वस्तुओं का मिश्रण पत्तेवाले पेड़, मूल्यवान पत्थरों की परीक्षा मामा, मित्र सम्बन्धि आदि ।
बृहस्पति - विवेक, बुद्धिमता, शिक्षण, शरीर की मांसलता, धार्मिक कार्य ईश्वर के प्रति निष्ठा बड़ा भाई पवित्र स्थान , दार्शनिकता , धार्मिक गर्न्थो का गठन , पाठन , गुरु , अध्यापक , धन बैंक , दान देना आदि ।
शुक्र - पति/पत्नी, विवाह, रतिक्रिया, प्रम सम्बन्ध, संगीत, काव्य, इत्र सुगन्ध, घर की सजावट ऐश्वर्य, दूसरों के साथ सहयोग, फूल फूलदार वृक्ष, पौधे सौंदर्य, आखों कक्ष आदि सुख सामग्री आदि।
शानि -अधार्मिक कार्य विदेशी भाषा, विज्ञान तथा तकनीकी शिक्षा मेहनत वाले कार्य, क्रूर कार्य, वृद्ध मन्ति, पंगुता, अंग-भंग, लोभ, लालच बिस्तरे पर पड़े रहना, चार दिवाने में बन्द रहना, जेल, हास्पीटल में पड़े रहना, वायु जोड़ों के दर्द कठोर वाणी आदि।
राहु - दादा का कारक ग्रह है। कठोर वाणी, जुआ, भ्रामक तर्क गतिशीलता, यात्राएं विजातीय लोग , विदेशी लोग , विष , चोरी , धार्मिक यात्राएं आदि।
केतु - नाना का कारक ग्रह है। दर्द, ज्वर, घाव, शत्रुओं को नुकसान पहुंचाना, तांत्रिक तन्त्र, जादू-टोना, कुत्ता, सींग वाले पशु बहुरंगी पक्षी, मोक्ष का कारक ग्रह है।
अब तक हमने इस अध्याय में भाव, भावों कारक तथा ग्रहों के कारकत्व पढ़े। इनका क्या लाभ है मानो हम चतुर्थ भाव का विश्लेषण कर रहे हैं। चतुर्थ भाव तथा चतुर्थश पीड़ित है। चतुर्थ भाव वाहन, सुख, अचल सम्पति, भूमि, शिक्षा तथा माता को दर्शाता है, किसको कष्ट होगा या किसके द्वारा कष्ट प्राप्त होगा? इसका निर्णय कारक ग्रह करता है। यदि चतुर्थ भाव तथा भावेश के साथ चन्द्रमा पीड़ित है तो माता को कष्ट, शुक्र पीड़ित है तो वाहन के द्वारा कष्ट, बुध पीड़ित है तो शिक्षा में कष्ट होता है। इस प्रकार घटना का सम्बन्ध भाव, भावेश तथा कारक ग्रह से होता है।


दोषपूर्ण व निदाँष रेखाएँ - हस्तरेखा


दोषपूर्ण रेखाओं का अध्ययन करते समय यह परम आवश्यक है कि दोनों हाथों को ध्यान पूर्वक देखा जाय अथवा रेखाओं को बारीकी से समझा जाय इस तरह किसी निर्णय पर आसानी से पहुंचा जा सकता है।

यदि एक हाथ में खराब चिह्न और दूसरे में ऐसा न हो तो उसका परिणाम उतना बुरा नहीं होता जितना कि दोनों हाथों में होने पर।

उदाहरण- किसी व्यक्ति के दाहिने हाथ में जीवन रेखा खराब है या कड़ी हुई है अथवा उसमें कोई दोष है, ऐसी स्थिति में तीन तरीकों से मृत्यु टल सकती है।
1. बायें हाथ में जीवन रेखा निर्दोष व पूर्ण हो।
2. जीवन रेखा पुन: उदित होकर पूरी हो जाये।
3. कोई सहायक रेखा जीवन रेखा का स्थान ले लेवें।


अपनी कार्यक्षमता और प्रतिभा जाने - हस्तरेखा



• मणिबंध का पहला वलय जजीरदार कठोर परिश्रम और सावधानी का जीवन परन्तु अन्ततः सफलता प्राप्त होती हैं
• मस्तिष्क रेखा से उदय तथा शनि पर्वत की ओर वृताकार रूप में जाती हुई भाग्य रेखा—परिश्रम भरा जीवन |
• गहरी हथेली तथा मुड़ी उंगलियों के साथ सूर्य रेखा प्रतिभा का दुरुपयोग।
• फीकी या हल्के से रंग की सूर्य रेखा कलात्मक प्रतिभा परन्तु कार्यान्वित करने की अपर्याप्त शक्ति ।
• सूर्य रेखा दोनों हाथों में स्पष्ट, साथ में सूर्य पर्वत पर एक तारे का चिह प्रतिभा द्वारा ख्याति |
• अच्छी सूर्य रेखा परन्तु साथ में दो लहरदार अनियमित रेखायें सूर्य पर्वत पर -पथ भ्रष्ट ।
• दूसरी उंगली पर त्रिकोण-तन्त्र विज्ञान द्वारा प्रतिभा ।
• अन्तः प्रेरणा-रेखा का उदय द्वीप के साथ-अन्तदृष्टि की प्रतिभा ।
• बहुत विकसित सूर्य—पर्वत, प्रखर प्रतिमा ।
• दोनों हाथों में अच्छी सूर्य रेखा, साथ में सूर्य पर्वत पर एक गहरी स्पष्ट रेखा-लाभप्रद प्रतिभा |
• सूर्य पर्वत पर दो लहरदार विषम रेखायें, साथ में अच्छी सूर्य रेखा पथभ्रष्ट प्रतिभा ।
• मस्तिष्क रेखा के अन्त में बुध पर्वत पर चढ़ती हुई रेखा नकल उतारने की प्रतिभा ।
• नर्म जोड़ तथा छोटा अंगूठा, साथ में चन्द्र पर्वत पर जाली-काव्य प्रतिभा ।
• अनामिका उंगली चपटाकार अग्रभाग सहित और दृढ़ सूर्य पर्वत भाग्य रेखा से एक शाखा बुध पर्वत की ओर- नाटकीय प्रतिभा ।
• बहुत दृढ़ और सीधी मस्तिष्क रेखा साथ में निकृष्ट हृदय रेखा ओर पतली उंगली उसकी दूसरी उंगलियों की अपेक्षा लम्बी, अर्थव्यवस्था की प्रतिभा ।
• तीसरी उगली लम्बे पर्व के साथ-कला में परिश्रम प्रतिभा तथा सामान्य बुद्धि का मिश्रण |
• चौथी उंगली कनिष्ठा, लम्बे दूसरे पर्व के साथ-परिश्रम तथा व्यापारिक क्षमता |
• सूर्य पर्वत पर दो रेखाये-सच्ची प्रतिभा, परन्तु साधारण सफलता।
• सूर्य पर्वत सूर्य रेखा के साथ ही एक नक्षत्र परिश्रम से भारी ख्याति।
• सूर्य पर्वत शुक्र का चिह्न, बुरे हाथ में प्रतिभा का दुरुपयोग।
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Question: I am living outside of India so what are the options for me to pay you?

Answer: Payment options for International Clients:

International clients (those who are living outside of India) need to pay me 20 USD via PayPal or Western Union Money Transfer.

  • PayPal (PayPal ID : nitinkumar_palmist@yahoo.in)
    ( Please select "goods or services" instead of "personal" )
  • PayPal direct link for $20 (You will get reading in 9/10 days) - PayPal Payment 20 dollars
    PayPal direct link for $35 (You will get reading in 24 hours) - PayPal Payment 35 dollars
  • Western Union: Contact me for details.

Question: I am living in India so what are the options for me to pay you?


Answer: Payment options for Indian Clients:

  • Indian client needs to pay me 600/- Rupees in my SBI Bank via netbanking or direct cash deposit.

  • SBI Bank: (State Bank of India)
       Nitin Kumar Singhal
       A/c No.: 61246625123
       IFSC CODE: SBIN0031199
       Branch: Industrial Estate
       City: Jodhpur, Rajasthan. 



  • ICICI BANK: 
      (Contact For Details)

Email ID: nitinkumar_palmist@yahoo.in



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In this palmistry website you will find palmistry articles in both Hindi and English languages with pictures, figures and diagrams. If you are interested in palmistry and want to become an expert then this blog will be helpful for you and guide you how to read palms.

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