Saturday, July 30, 2016

Myth About Short Life Line

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Short Life Line—Only reaching the center of the palm? A short life line, contrary to popular myth, does not mean a short life. The length of the life line is related more to a person's energy levels than to time or the length of life.

When short and thick, it indicates intense energy but a relatively incident-free life. This may mean a monotonous life, but it can also show that the subject has ceased to accept the challenges of life, and has become somewhat withdrawn or self-absorbed.

If the line is short and thin, faded or broken, poor health and withdrawal of social life may be the subjects challenge (see Figure 30).

Anyone who's practiced palm reading for a significant period of time knows that a short Life Line does not mean a short life. Never. Modern palm readers do not read the length of the Life Line as an indicator of length of life.

Thursday, July 28, 2016

Mount of Moon | Mount of Luna | Palmistry | Meanings | Position | Location

The Mount of Moon

  The Mount of Moon, also known as the Mount of Luna, is located on the palm of the hand at its base, on the little finger side of the hand.

   The mount of Moon represents:

Interest in poetry
Inclination towards the occult
Love of luxury
Influence of women (on men's hands)
Feminine health problems (in women's hands)

A well-developed mount of Moon indicates a highly imaginative person with creative qualities.

A cross on the mount of Moon shows health problems.

A star on the mount of Moon, while indicating vivid imagination, also portends travel dangers or danger of drowning.

A triangle on the mount of Moon accentuates imaginative qualities.

An island shows health problems, as does a spot.

A grille on the mount of Moon indicates a tendency to worry'.

A circle portends fear of drowning.

A square on the mount of Moon protects from travel dangers.

Tuesday, July 26, 2016

जीवन रेखा से व्यक्ति की आयु जानना

आप सभी के मन में इस प्रकार के सवाल अवश्य आते होंगे की क्या मैं अल्पायु हूँ ? मेरी आयु कितनी होगी ? मैं कितने वर्ष तक जियूँगा ?

जीवन रेखा से व्यक्ति की आयु जानना

हस्तरेखा की पुस्तकों में बताया गया होता है की यदि व्यक्ति की हृदय रेखा छोटी हो तो व्यक्ति अल्पायु होता है, यदि मस्तक रेखा छोटी हो तो व्यक्ति अल्पायु होता है, व जीवन रेखा छोटी हो तो व्यक्ति अल्पायु होता है , यदि जीवन रेखा के अंत में क्रोस हो तो व्यक्ति की आकस्मिक मृत्यु होती है ! इस प्रकार के कई योग हस्तरेखा की पुस्तकों में बताये गए होते, जिनमे कोई भी सत्यता नहीं होती है !

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अक्सर लोग इन पुस्तकों को पढ़कर चिंता में डूब जाते है की शायद इश्वर ने उनको कम उम्र दी है अपितु ऐसा नहीं होता है ! जीवन रेखा के छोटी होने पर कलाई (मणिबंद) से आती हुई भाग्य रेखा जीवन रेखा का कार्य करती है! जीवन रेखा से व्यक्ति की आयु का अनुमान लगाना कदापि उचित नहीं है ! जीवन रेखा से व्यक्ति के स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियो में आने वाले उतार-चढाव का अनुमान लगाया जाता है !

यहाँ पर होलीवुड के प्रसिद्ध कलाकार गेरी कोलमन के हाथ का चित्र दिखाया जा रहा है आप देख सकते है की उनकी जीवनरेखा कलाई तक पहुच रही है व स्पष्ट है लेकिन गेरी कोलमन का निधन 42 वर्ष की आयु में ही हो गया था !

death from life line

short life death line

यहाँ पर होलीवुड की प्रसिद्ध कलाकार जेड गूडी के हाथ का चित्र दिखाया जा रहा है आप देख सकते है की उनकी जीवनरेखा 50-55 की आयु पर समाप्त हो रही है व ऐसी स्थिति में भाग्य रेखा जीवन रेखा का कार्य करती है लेकिन जेड गूडी का निधन सिर्फ 28 वर्ष की उम्र हो गया था !

hand predict death from short life line

यहाँ पर तमिल फिल्मो की प्रसिद्ध कलाकार सोंदार्या के हाथ का चित्र दिखाया जा रहा है आप देख सकते है की उनकी जीवनरेखा कलाई के समीप समाप्त हो रही है लेकिन सोंदार्या का निधन सिर्फ 28 वर्ष की उम्र हो गया था !

आप अनुमान लगा सकते है की अच्छी जीवन रेखा होने के पश्चात भी इन कलाकारों की मृत्यु कम उम्र में ही हो गयी व इसके विपरीत ऐसे लोग भी होते है जिनकी जीवन रेखा छोटी होते हुए भी वे लम्बी आयु प्राप्त करते है उसका कारण जीवन रेखा के पास से निकलती हुई भाग्य रेखा जीवन रेखा का कार्य करती है !

अर्थात, जीवन रेखा से आयु का अनुमान लगाना कदापि उचित नहीं है !

-नितिन कुमार

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Monday, July 25, 2016

Marriage line On Sadhu/Gay/Hijra/Eunuch Hand Indian Palmistry

Marriage line On Sadhu/Gay/Hijra/Eunuch Hand Indian Palmistry

Marriage Line is also called Line of Affection.  Marriage line does not necessarily show marriage it may only indicate attachment to someone male or female.  In other words this line can indicate anyone whom you consider a friend or loved one.  Marriage line is often found on unmarried person, celibates, saints (sadhu), and kinnar, bisexual, hinjda, eunuchs, and in such cases indicates strong friendship.  So every marriage line does not necessarily represent marriage but it does represent an affection that you have felt or feel for someone.    Keywords: Trans Man


Sunday, July 24, 2016

The Venus Lines - Palmistry

The lines on the mount of Venus are known as Venus lines. Mostly, these arc vertical lines concentric to the line of life. The Venus lines represent relationships with the people around a person: friends, relatives etc. Vertical lines represent helpful relationships. Horizontal lines represent antagonistic: interference from people.

The more vertical lines there are, the more friends one will have and these indicate one's popularity in the social whirl. Persons devoid of lines on the Venus mount have very few friends. They do not need and do not get the affection of others. The Venus lines may be called the lines of personal contact. Venus lines starting from the line of life indicate sexual relationships.

The more prominent of the vertical Venus lines represent family attachment, usually towards one's siblings. The line of Mars should be clearly distinguished from the vertical Venus lines.  chinese palm reading

Saturday, July 23, 2016

The Line of Intuition or the Line of Moon

The line of intuition is the line starting from the lower part of the mount of Moon and going up to the mount of Mercury or negative Mars in a gentle curve (see diagram). This line, if present, indicates a strong gift of intuition. It is found in the hands of persons with unusual powers of the mind, extra-sensory perceptions and clairvoyance.  Hand Reading Money Line

Thursday, July 21, 2016

परिवार में सुख-चैन की कमी होना ( Parivar Mein Sukh Nahi Hona )

परिवार में सुख-चैन का नहीं होना :-

यदि आपके परिवार में कलह रहती है और सुख का आभाव है तो आप ये उपाय कीजिये आपको लाभ होगा ।

मंगलवार को सूर्यास्त के समय कुछ कच्चे कोयले जलाकर अंगारे बना ले और उन्हें किसी बर्तन में रखकर के उन पर लोबान  या देसी कपूर या गूगल को डाल दे और जो धुंआ निकले उस धुंए को सारे घर में घुमा दे और अंत में कोयले को घर के बाहर किसी स्थान पर डाल आए । ऐसा आपको तीन माह प्रत्येक मंगलवार को करना है । आपके परिवार में बरकत होने लगेगी और आपस में मन-मुटाव कम होगा और घर में शांति बनेगी ।

यदि परिवार पर कर्ज ज्यादा है तो ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र , राम रक्षा स्त्रोत नियमित पडें और हनुमान जी की पूजा नियमित करें । 

Parivar Mein Sukh Chen Ka Nahi Hona:-  

Yadi aapke parivar mein kalah rahti hai aur sukha ka aabhav hai to aap ye upay kijiye aapko labh hoga.1

Mangalawar  ko suryast ke samay kuch kacche koyle jalakar ke angare bana le aur unhe kisi bartan mein rakhkar ke un pr lobaan ya deshi kapoor ya google ko daal de aur jo dunha nikle us dunhe ko sareein ghar mein ghuma de aur ant mein koyle ko ghar ke bahar kisi isthan pr daal aay.  Aisa aapko een mah prteyek mangalwar ko karna hai.  Aapke parivar mein barkat hone lagegi aur apas mein manutav kam hoga aur ghar mein shanti bangegi.

Yadi parivar pr karj jyada hai to hrinharta ganesh strot, ram raksha strot niymit pade aur hanuman ji ki puja vidhi poorvak kijiye.

लहरदार मस्तक रेखा

लहरदार मस्तक रेखा

टेड़ी-मेडी मस्तिष्क रेखा, टेड़ी-मेड़ी ही होती है। दोषपूर्ण मस्तिष्क रेखा के सारे फल यहां भी लागू होते हैं ।
विशेषतया किसी भी आदत के पक्के होने पर, ऐसे व्यक्ति वह आदत छोड़ने में कठिनाई महसूस करते हैं। इनका कोई भी कार्य लम्बे समय तक ठीक नहीं चल पाता। ऐसा देखा गया है कि इनके काम छः महीने ठीक और छः महीने खराब चलते हैं। ऐसे व्यक्ति मौसमी कार्य जैसे गन्ने का क्रेशर, भट्टा, अनाज का श्रेशर, चूने की भट्टी, बर्फ के कारखाने आदि के कार्य करते हैं। (नितिन पामिस्ट)

मस्तिष्क रेखा के अन्त में द्वीप होना

मस्तक रेखा पर द्वीप

मस्तिष्क रेखा के अन्त में अर्थात् बुध के नीचे द्वीप हो तो यह व्यक्ति के जिगर में खराबी करता है। इस प्रकार का कष्ट 52-53 वर्ष की आयु के पश्चात् ही बढ़ता है। मस्तिष्क रेखा में द्वीप न होकर कोई त्रिकोण का आकार बनता हो तो यह चलते समय सांस फूलना या फेफड़ों में खराबी होने के लक्षण है। यह द्वीप केवल स्वास्थ्य के लिए ही फल बताता है ।

मस्तिष्क रेखा के अन्त में यदि बड़ा द्वीप हो तो व्यक्ति के किसी न किसी से अनैतिक सम्बन्ध रहते हैं। ऐसे सम्बन्ध कभी जीवन के आरम्भ में 30-32 वर्ष की आयु में भी देखे जाते हैं लेकिन अन्त में तो निश्चित ही होते हैं। यह लक्षण रखैल रखने का है। (नितिन पामिस्ट )

ऐसे व्यक्तियों की आखों में भी किसी न किसी प्रकार का रोग रहता है। यहां यह बात विशेष रूप से देखने की है कि ये द्वीप ऐसी रेखाओं से मिलकर बनते हैं जिनकी मोटाई मौलिक मस्तिष्क रेखा से कुछ ही कम होती है। इस दशा में मस्तिष्क रेखा की कोई शाखा बुध वाले भंगल पर गई हो तो ऐसे सम्बन्ध किसी नजदीकी से होते हैं। यह अवश्य कहा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति रखैल या उप-पत्नी रखते हैं।

हृदय रेखा पर सूर्य पर्वत के नीचे द्वीप होना

द्वीप हृद्य रेखा पर होने का मतलब 

यह द्वीप भी आंखों के दोषों को निश्चित करता है। शनि के पर्वत पर अधिक रेखाएं या मस्तिष्क रेखा में शनि के नीचे द्वीप होने पर अवश्य ही आंखों में दोष होता है। सूर्य के नीचे हृदय रेखा में द्वीप दूर की नजर के लिए अच्छा नहीं माना जाता । अतिशय-कामुकता; पित्त या जिगर दोषपूर्ण होने के कारण आंखों में खराबी पाई जाती है। इसी लक्षण से सिर में भारीपन भी रहता है। एक बात विशेष ध्यान रखने की है कि हदय रेखा में दोष होने पर मस्तिष्क रेखा निर्दोष हो तो कुछ समय के लिए ही आंखों में दोष पैदा होते हैं। कालान्तर में आख्चे ठीक हो जाती हैं। सूर्य के नीचे हृदय रेखा में दोप के साथ यदि मस्तिष्क रेखा में भी दोष हो तो सिर दर्द के कारण डर रहता है। ऐसे व्यक्तियों को साइनस का रोग पाया जाता है। इन्हें नाक से दूध पीना, सूत्र-नेति करना, बादाम रोगन पीना लाभकर रहता है। ऐसे व्यक्तियों को पेट में खराबी, नजला-जुकाम आदि का उपचार यथा समय व यथा शक्ति कराना चाहिए। (नितिन पामिस्ट)

स्त्रियों में आखों के दोष, प्रजनन के समय में कोई गड़बड़, अधिक रक्त स्राव, दौरे या सिर में चोट लगने से होता है। हाथ में अधिक दोष जैसे प्रत्येक रेखा में विशेघ दोष, मस्तिष्क रेखा अधिक दोषपूर्ण या जीवन रेखा टूटी हो तो मस्तिष्क में रसौली या कैंसर होने के कारण आखें खराब हो जाती हैं। हृदय रेखा टूट कर मस्तिष्क रेखा पर मिलने पर मस्तिष्क रेखा में सूर्य के नीचे दोष हो तो अधिक रोने के कारण आखों में दोष होता है। सूर्य या बुध के नीचे कोई वृत्ताकार द्वीप चाहे यह कई रेखाओं के द्वारा ही बना हो या बाहर की ओर से कोई रेखा सूर्य या बुध के नीचे छूती हो और मस्तिष्क रेखा में दोष व जीवन रेखा के आरम्भ में दोष हो तो पूर्णतया अन्धा होने का लक्षण कई बार हृदय रेखा पर त्रिकोण का आकार भी बुध या सूर्य के नीचे देखा जाता है । यह आकार निर्दोष दृदय रेखा पर होता है। वास्तव में यह द्वीप होता है और आरबों में विशेष दोष का लक्षण है। हदय रेखा में नीचे की ओर होने पर यह अधिक प्रभावशाली होता है।

हृदय रेखा मंगल से निकलने पर यदि सूर्य के नीचे द्वीप हो तो भी आंखों में दोष होता है। यह दोष पित्त के कारण आख्झें खराब होने का लक्षण है। ऐसे व्यक्तियों के घर में तिरछा देखने वाले (भैगे), एक आख बन्द करके देखने वाले या सूर्य-मुखी व्यक्ति होते हैं। सन्तान पर भी इसका प्रभाव देखा जाता है। ऐसे व्यक्तियों के चरित्र में किसी न किसी प्रकार का दोष भी होता है। हदय रेखा, सूर्य के नीचे द्वीपयुक्त होने से सन्तान की आंखें कमजोर होती हैं। हाथ पतला ". होने पर अधिकतर बच्चों को चश्मे का प्रयोग करना पड़ता है और भारी हाथ होने पर एक या दो चश्मे लगाते हैं। यदि मस्तिष्क रेखा में कोई दोष नहीं हो तो कुछ समय के लिए ऐसा होकर आंखें ठीक हो जाती हैं।

मंगल ग्रह हस्तरेखा

मंगल पर्वत हस्तरेखा

मंगल ग्रह का स्थान हाथ में दो जगह होता है। एक तो अंगूठे के पास बृहस्पति के नीचे, दूसरा बुध की उंगली के पास बुध के नीचे। पहला स्थान यदि बड़ा हो तो अकारात्मक होता है और उसका महत्व अधिक हो जाता है। यदि व्यक्ति का जन्म 21 मार्च और 21 अप्रैल के बीच में हो और यदि 28 अप्रैल तक हो। कुछ हद तक होता है। वर्ष का यह भाग भचक में मंगल का भाव सकारात्मक कहलाता है। (नितिन पामिस्ट )

दूसरा स्थान नकारात्मक होता है और उसका महत्व अधिक होता है। यदि व्यक्ति का जन्म 21 अक्टूबर और 21 नवम्बर कॊ बीच में हो और यदि जन्म 28 नवम्बरं तक हो तो कुछ हद तक होता है वर्ष का यह भाग भचक में मंगल का भाव नकारात्मक कहलाता है।

मंगल का सम्बन्ध व्यक्ति के साहस, क्रोध, धैर्य, निष्ठा, खेती, पेट विकार आदि से है। अत: मंगल उठा होने पर उपरोक्त गुण पाये जाते हैं। परन्तु पेट में विकार रहता है। जो व्यक्ति प्राय: राजसेवा में होते हैं, उनके हाथ में उठा हुआ मंगल होता है। ऐसे व्यक्ति अति निष्ठावान होते हैं। अतः राज्यसेवा में उनका स्थान सेना, पुलिस, जल सेना या इस प्रकार के पदों पर होता है। उनकी उंगलियां भी मोटी देखी जाती हैं। ये मस्तिष्क का प्रयोग कम ही करते हैं। साथ ही जिद्दी, क्रोधी, साहसी, लगन वाले आदि होते हैं। स्पष्टवक्ता होते हैं और गलत बात को भी सहन नहीं करते। हदय रेखा का अन्त वृहस्पति पर हो तो ऐसे व्यक्ति महान, साहसी, सत्यवादी, आन पर मरने वाले व कई भाषाओं के ज्ञात होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के हाथ गुलाबी होते हैं। इनके मकान या सम्पति पर झगड़ा पाया जाता है। (नितिन पामिस्ट )

मंगल अधिक उठा होने पर व्यक्ति को विवाह में रुकावट होती है। विवाह देर से होता है या सम्बन्ध होकर टूटता है। ऐसे व्यक्तियों को मूंगा पहनना चाहिए। मंगल उठा होने पर इसका विशेष फल 1 12, 4, 8, 12, 14, 28 व 48 वर्ष में देखा जाता है। (नितिन पामिस्ट )

मंगल उत्तम होने पर व्यक्ति यदि भावुक भी हो तो आत्महत्या जैसी घटनाएं नहीं करता। मस्तिष्क रेखा में दोष होने पर व्यक्ति स्पष्टत्रक्ता, झगड़ालू, बेहद चिड़चिड़े व क्रोधी स्वभाव के होते हैं। मस्तिष्क रेखा सुन्दर होने पर साहसी, बर्दाश्त न करने वालं होते हैं। ऐसे व्यक्ति दबते नहीं। सत्य का अन्तत: पालन करते हैं। जुबान के पक्के होते हैं, सच्चे व स्वाभिमानी होते हैं। परन्तु मस्तिष्क रेखा अधिक सुन्दर होने पर ये बेहद चालाक देखे जाते हैं। इनका मकान ऊची जगह पर होता है तथा यह कार्य भी समतल भूमि से ऊंचे पर ही करते हैं।

मंगल पर क्रास होने पर बवासीर हो जाती है। यदि मस्तिष्क रेखा में शनि की नीचे दोष हो तो निश्चय ही ऐसा कहा जा सकता है। मस्तिष्क रेखा में अन्य दोष होने पर ये अपनी स्मृति को कमजोर समझते हैं। विशेष दोष होने पर बड़ी आयु में इनकी स्मृति कमजोर भी हो जाती है।

मंगल पर काला या लाल दाग होने पर इनकी मृत्यु विष से होने की सम्भावना होती हैं।

मंगल पर तारा होने पर क्रोध अधिक आता है और झगड़ों में मार-पीट व चोट लगती है। मस्तिष्क रेखा में दोष हो तो यह भी सम्भावना होती है कि इनके हाथ से किसी की हत्या हो जाये।

मंगल पर अधिक रेखाएं होने पर भेंट में गैस, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता हैं। फलस्वरूप धातु विकार होते हैं। सिर में दर्द रहता है। चन्द्रमा उन्नत हो तो ऐसा निश्चय ही होता है। सर्दी का असर नाक व गले में बना रहता है। (नितिन पामिस्ट )

मंगल पर चतुष्कोण होने पर जेल का डर भी होता है। कई बार जेल यात्रा भी करनी पड़ती है।

मंगल पर त्रिकोण होने पर उच्चकोटि के गणितज्ञ होते हैं। इन्हें सेना या शोध कार्य में सम्मान मिलता है।

Wednesday, July 20, 2016

मस्तक रेखा का निकास बृहस्पति पर्वत से होना

मस्तक रेखा का निकास बृहस्पति पर्वत से होना  

बृहस्पति ग्रह आत्मसम्मान, महत्तकांक्षा, प्रौदता व शासन का प्रतीक है। हाथ में बृहस्पति उन्नत होने पर व्यक्ति सचरित्र, महत्वाकांक्षी तथा शासकीय प्रवृति के होते हैं। इसी प्रकार जिन लोगों की मस्तिष्क रेखा बृहस्पति से निकलती है, उन व्यक्तियों में स्वभावतः ही उपरोक्त सभी गुण आ जाते हैं। ऐसे व्यक्ति पुरुषार्थ से जीवन बनाते हैं (चित्र-67) तथा स्वयं के गुणों में निरन्तर वृद्धि करने वाले होते हैं। इनकी मस्तिष्क शब्द कोष होता है व ग्रहण-शक्ति अच्छी होती है। ये बैद्धिक त्रुटियां नहीं करते। संयोगवश यदि कोई गलती कभी कर जाएं तो पुनरावृति का तो प्रश्न ही नहीं उठता। महत्वाकांक्षा की विशेष भावना इनमें पाई जाने के कारण अध्ययन के समय ये गुट बना कर रहते हैं: रुढिवादिता इन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं होती, अतः अपने परिवार वालों से इनका विरोध बना रहता है। अध्ययन में तो ये निपुण होते हैं, परन्तु मेहनती नहीं होते।

ऐसे व्यक्तियों की उंगलियां मोटी हों तो आत्म-सम्मान के कारण झगड़े आदि रहते हैं तथा मस्तिष्क रेखा की कोई शाखा मंगल पर जाती हो तो कत्ल जैसे लांछन भी जीवन में लगते हैं। यह सब, सम्मान अथवा महत्वाकांक्षा के कारण ही होता है। (नितिन कुमार पामिस्ट )

सुधारवादी दृष्टिकोण के कारण इनके चरित्र में धीरे-धीरे सुधार होता जाता है। यदि मस्तिष्क रेखा में कोई दोष जैसे लाल या काली न हो तो समय आने पर ऐसे व्यक्ति स्वयं पैरों पर खड़े हो जाते हैं। उगलियां पतली होने पर उपरोक्त दोषपूर्ण फल नहीं होते। ये स्वाभिमानी होते हैं, झुकना पसन्द नहीं करते और छोटी सी बात को भी बहुत महसूस करते हैं। कभी-कभी यहां तक नौबत आती है कि छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा कर बैठते हैं। यदि इनकं गृहस्थ-सम्बन्ध में जरा भी त्रुटि हो तो छोटी सी बात पर ही अपमान महसूस कर जाते हैं जैसे यदि पत्नी विना कहे कहीं चली जाए तो ये उसे लेने जाएं, ऐसा प्रश्न ही नहीं उठता। थोड़ा भी विरोध आपस में होने पर, दूसरे को ही झुकना पड़ता है। ऐसी स्त्रियां रोने में तेज, अड़ने वाली, शुरू में डरने वाली तथा बाद में बहादुर होती हैं। ----- इन्हें छोटे काम करने में लज्जा अनुभव होती है।  कभी-कभी आत्मसम्मान की मात्रा यहां तक बढ़ जाती है कि यदि गलत बात मुंह से निकल जाए तो उसी पर अड़ जाते हैं। छोटा काम नहीं करने के कारण स्थायित्व देर से प्राप्त होता है क्योंकि जब तक इनकी रुचि का कार्य नहीं मिलता, तब तक ये अपने आपको स्थायी महसूस नहीं करते और लगातार काम बदलने की सोचते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों की भाम्य रेखा चन्द्रमा से निकली हो तो स्त्री लोलुप होते हैं। (नितिन कुमार पामिस्ट )

ये मिलनसार व दृढ़ निश्चयी भी होते हैं। जिससे इनका परिचय या मित्रता हो जाती हैं, जीवन भर निभाते हैं, मित्रता होती भी अधिक व्यक्तियों से है। स्वयं से कोई गलती या अपराध होने पर क्षमा मांगने में देर नहीं करते और यदि कोई व्यक्ति गलती करके इनसे क्षमा मांगे तो क्षमा भी कर देते हैं। ऐसे व्यक्तियों की दृदय रेखा व मस्तिष्क रेखा यदि एक-दूसरे के समानान्तर हो तो बदले की भावना रहती हैं, जिसके पीछे पड़ते हैं, उन्हें जड़ से उखाड़ देते हैं। परोपकारी, व्यवहारिक व मानवोचिन गुण होने के साथ ही जैसे के साथ तैसा व्यवहार करने वाले होते हैं।

 ऐसे व्यक्ति झगड़े में कम पड़ते हैं और यदि किसी झगड़े में आ भी जाते हैं तो उसका निपटारा भी स्वयं ही कर देते हैं। मुकद्दमें लड़ने में यदि डिकरी भी हो जाए तो ऐसे व्यक्ति उन्हें क्षमा मांगने पर छोड देते हैं। पैसा देने या अन्य कोई वायदा ये करते हैं तो उसका पूर्णतया पालन करते हैं, चाहें अपना काम बन्द करके भी करना पड़े। अत: बाजार में इनकी साख होती है। मस्तिष्क रेखा समानान्तर होने पर ये लम्बे  समय तक किसी बात को नहीं भूल सकते और अवसर आने पर बदला लिए बगैर नहीं छोड़ते। 

ऐसे व्यक्ति अपने शत्रु को जान से नहीं मारते, जीवित रखकर मुकाबला करते हैं या अहसान से मारते हैं। उत्तरदायित्व अधिक अनुभव करने के कारण ऐसे व्यक्ति उस समय तक विवाह नहीं करते जब तक ये अपने पैरों पर खड़े न हो जाएं। अतः अपनी शादी तक रोक देते हैं तथा आदर्श पसन्द या अन्य किसी करण से इनकी शादी में कई बार विध्न पड़ता है।

दो अंगूठे हस्तरेखा (Twin Thumb/Two Thumb)

दो अंगूठे 

 अंगूठे एक से अधिक संख्या में होना अच्छा नहीं है। ऐसे व्यक्ति क्रोधी तो नहीं होते, परन्तु शेष सभी लक्षण टोपाकार अंगूठे से मिलते-जुलते होते हैं। ऐसे व्यक्ति अनेक झझट अपने सिर पर रखते हैं। जल्दबाज व बुद्धिमान होते हैं। ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखी नहीं रहता। नौकरी में होने पर ऐसे व्यक्तियों पर विभागीय कार्यवाही भी होती है या इन्हें बीच में नौकरी बदलनी पड़ती है। व्यापार में ही पर विश्वास के कारण धोखा खाना पड़ता है। घर में भी ऐसे व्यक्ति का व्यवहार क नहीं होता। आलोचना करना, बात-बात में टोकना, छोटी-छोटी बात में क्रोध करना आदि स्वभाव के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों की सन्तान विद्वान होती है। सन्तान सम्बन्ध में भी ऐसे व्यक्ति कुछ न कुछ कमी अवश्य महसूस करते हैं। यदि मुख्य अंगूठा लम्बा हो तो दुर्गुणों में कमी होकर ये विद्वान व सफल होते हैं। (नितिन कुमार पामिस्ट)

 लम्बा व चौड़ा अंगूठा क्रोधी व बुद्धिमान व्यक्तियों का होता है, परन्तु ये व्यक्ति स्पष्टवक्ता, सिद्धान्तवादी व स्वतन्त्र विचारक होते हैं। अत: विचारों के विषय में इनकी खिचड़ी अलग पकती है। स्वतन्त्र मस्तिष्क होने के कारण अधिक समय तक सम्मिलित नहीं रह पाते, चाहे व्यापार हो या परिवार।

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Saturday, July 16, 2016

सहायक बुधरेखा Palmistry

सहायक बुधरेखा

सहायक बुध रेखा को कामभावना की रेखा भी कहते हैं। यह बुध रेखा के साथ उसके समानान्तर होती है। यदि यह दोनों हाथों में पाई जाए तो व्यक्ति में धन एवं काम की इच्छा अत्यधिक होती है। यह स्वास्थ्य रेखा पर आए हुए दोषों की मरम्मत अथवा उनको दूर करती है, बशर्ते की यह स्पष्ट एवं दोष रहित हो।

1. बुध पर्वत तक पहुंचने पर यह रेखा व्यक्ति को भाग्यशाली, कुशल वक्ता एवं चतुर बनाती है लेकिन चारित्रिक रूप से व्यक्ति पर भरोसा नहीं कर सकते हैं।

2. इस रेखा के स्वास्थ्य या बुध रेखा को काटने पर व्यक्ति को लीवर, भूख न लगना एवं अतिभोग के कारण स्वास्थ्य गिरा रहना संबंधी परिणाम होते हैं।

3. इस रेखा के अंत में दो शाखा युक्त होने पर व्यक्ति भोगी, आलसी व नि:शक्त हो जाता है।

4. इस रेखा से उदित कोई शाखा सूर्य रेखा को काट देती है तो धन-मान हानि होती हैं। यदिरेखा विलीन हो जाए तो धनागम होता है।

5. इसरेखा के लहरदार होने पर व्यक्ति व्यभिचारी हो जाता है तथा भाग्य वृद्धि में अवरोध आता है ।

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Friday, July 15, 2016

एकादश भाव में राहु

एकादश भाव में राहु - एकादश भाव में सभी ग्रह शुभ फलदायक होते हैं अत: राहु भी शुभफलदायक है। पापमार्ग से धन लाभ जिसका दुष्परिणाम संतानों, पुत्रों पौत्रों को भोगना पड़ता है अत: पाप के धन से बचना ही श्रेयस्कर तथा शुभ है। स्त्रीराशि में - शुभफल पुरुष राशि में अशुभफल पुरुष राशि में - पुत्र संतति में बाधा, पूर्व जन्म का शाप, पुत्र की मृत्यु, गर्भपात, पत्नी को सन्तति प्रतिबंधक योग में प्रजनन अंगों के रोग अथवा संतान उत्पन्न करने की अक्षमता होना। अचानक धनी होने की इच्छा, दौड़, शेयर सट्टा, लाटरी, जुआ में धन खर्च, अधिकारी होने पर अन्धाधुन्ध रिश्वत लेना, कानून के चंगुल में फाँसकर दण्ड, अपमान, नौकरी छूटना, कारावास आदि भोगना, लोभी स्वभाव, मित्रों से हानि, भाग्योदय में रुकावटें।

स्त्रीराशि में प्रथम सन्तान कन्या, बहुत समय बाद पुत्र, पुत्रियां अधिक, मित्र अच्छे, ज्योतिष या मन्त्रशास्त्र में कुशल, उनकी सहायता से जीवन चलना, रिश्वत लेने पर पकड़ा न जाना, व्यापार व नौकरी दोनों में सफल बडी भाई की मृत्यु या बेरोजगारी से उसके कुटुम्ब का बोझ भी स्वयं उठाना 42वें वर्ष सहसा । प्राप्ति. 28वें वर्ष आजीविका प्रारंभ 27वें वर्ष विवाह।

Tuesday, July 12, 2016

Mayur Chinha Hindu Palmistry (Peacock Sign In Palmistry)

Mayur Chinha:- Gandharva Kala mein roochi, bhogi aur samannit vykti.

Banawat:  Mor pankh ki pahchan hoti hai uske failey hue pankh.  Hath mein bhi mor ke failey hue pankho ki aakriti (chitra sankhya 290) ke anusaar jeevan rekha, bhagya rekha, surya rekha, swasthya rekha awam yatra rekha se banti hai. (wallpaper white peacock feathers price for sale)

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Saturday, July 9, 2016

Prabhaav Rekha Ka Arth- Hastrekha

prabhav rekha vykti ke jeevan mein bahut bada badlav laati hai

Vytki samaaj mein rahta hai. samaj ka prabhaav sabse jyada uske man tatha mastik pr padta hai . Ishi samaaj mein rishtedaar, bhaai-bandhu, mitra ityadi shamil hote hai. Vykti ke uthaan-patan mein inhi sab logo ka yogdaan rahta hai. Vkti inke dwara padne wale sakaratamak prbhaav awam yogdaan se prasaan hota hai tatha nakaratamak prbhaav awam vigano se dukhi awam chintit hota hai. Jeevan bhar vykti inhi ke beech apne jeevan ka sanchalan karta hai. Inhi ke karan jeevan mein anek prakaar ke utar chadaav dekhne ko milte hai jo use kabhi kabhi bahut adhik tath gahraai tak prbhavit kar dete hai. Inse milne wale acche aur bure prbhaavo se vykti ka jeevan bahut adhik prbhavit hota hai. Hastrekha shastra mein ye acche bure prbhav rekhao ke madhyam se jatak ki hatheli pr drishtigochar hote hai. Jin rekhao dwara ye prakat hote hai, unhe chinta rekha athwa prbhav rekha kaha jata hai.

In prbhaav rekhao ke madhyam se vykti ke bareein mein kaafi aur sateeek jaankari mil sakti hai, jo is prakaar hai-

-Vykti ko shukra, mangal awam chandra khestra se udit hone wali prbhaav rekha swarwadhik prbhavit karti hai. Mukhya rekhao yatha jeevan rekha, hridya rekha, bhagya rekha, mastak rekha ityadi ke atirikt in prbhaav rekhao se bhi jatak prbhavit hota hai. Ye prbhaav rekhay mukhya rekho ke falo ko parivartit karne ki shamta rakhti hai.

- Hatheli mein sabse bada khestra shukra ka hota hai tatha jyadatar prbhav rekhay yahi isthit hoti hai. Inme se kuch spasth hoti hai tatha kuch bareek bareek awam jaal se dikhai padti hai. Inhe chinta rekhay kaha jata hai jo chinta utpann karne ka karan banti hai tatha manshik aur sharirik durbalata ki taraf ishara karti hai. (dekhe chitra sankhya 219)

- Sukra awam niman mangal se udit chotti chotti prbhav rekhay jitani baar jeevan rekha ko kaatti hai, jatak ke jeevan mein ristedaaro awam mitro ka utana hi dhakal hota hai. Yadi inki sankhya adhik ho to ye jatak ke liye chinta ka karan ban jaati hai. (dekhe chitra sankhya- 220)

- Kai baar shukra khestra pr mangal rekha ke samantar rekhay chalti hai jo jatak pr viprit ling jaatako ka prbhaav darshaati hai. Yadi ye apna rasta badal le to us avadhi mein jaha se ye parivartit hoti hai waha se jatak pr unka prabhaav kam hona shuru hota hai. Yadi aage ki avadhi tak ye rekhay gahri hoker chale to jatak pr ungka gahra prabhav hota hai. (dekhein chitra sankhya-221)

- Shukra se udit prbhav rekha, jeevan rekha ko kaat kar brihaspati tak pahuchey to jatak mahatvakanshi awam dhambi ho jata hai. Sath hi ya rekha yadi kisi aadi rekha dwara bhadhit ho jaay to yah asafalta dharshati hai. Parantu yahi rekha jab kisi sitare se sanyong kr le (brhispati pr) to yah jatak ko safal siddh karti hai. Ukt prbhav rekha brihaspati tak aay tath achanak hi mod le kar shani khestra pr pahuch jaay to jatak dharmikta ka awaran od kr apni aajeevika chalata hai. (dekhein chitra sankhaya-222)

- Sukhra kestra se udit prbhav rekha, jeevan rekha se udit kisi urdhav rekha ko kaatti hui shani ke kehstra pr pahuche to jatak ka vevahik jeevan vighatan athva kalesh purna vevhahik jeevan hota hai. (dekhein chitra sankhya-223)

- Iske atirikt shukra/nimn mangal se udhit prbhav rekha shani khestra pr pahuchkar dwishakha ka roop dharan kr le to yah durghatana athva dukhad vevhahik jeevan darshati hai. Arthat dukhad vevavhik jeevan hi ek durghatana siddh hota hai. (dekhe chitara sankhya - 224)

- Shukra athawa mangal se udit prbhv rekha ka madhyama ungli ke tritiya parva mein prevesh karna aurato mein garbhashay sambandhi vikarao ke karan santan prapti mein badha darshata hai. (dekhe chitra sankhya - 225)

- Sukhra khestra se udit prbhav rekha seedhi surya parvat pr pahuche to jatak ki unnati awam yash vridhi mein uske ristedaro awam mitro ka sahyog rahta hai. Yadi yah prbhaav rekha lahardaar hokar chale to safalta awam yash mein badha hoti hai. (dekhe chitra sankhya -226)

- Angoothe ke doosare pore se chalkar aane wali prbhaav rekha, jeevan rekha ko kaat de to jaatak ka koi ristedaar athava mitra uske sath dokha karta hai. Iske viprit yahi rekha yadi angoothe ke pahle pore se chalkar jeevan rekha ko kaat de to kisi ristedaar ki vishawasghat ki wajah se jatak ki kisi hathiyaar se mrityu ho sakti hai. (dekhe chitra sankhya-227)

- Kisi ardhchndrakar rekha ke jeevan rekha ko kaatne pr jatak ki mrityu ya mrityu tulya kasth ho sakta hai, kyuki aise awastha mein jeevan rekha mein pranshakti ka pravah ruk jata hai. (dekhey chitra sankhya - 228)

- Shukra se udit prbhav rkeha yadi jeevan rekha, bhagya rkeha, mastak awam surya rekha ko kaati hui urdhav mangal pr pahuche to kisi parichit ki wajah se jatak ke sir mein chot lag sakti hai. Iske viprit urdhva mangal pr rekhao ka jaal ho athwa urdhav mangal viksit ho to aise isthiti mein jatak mein krodh ki matra adhik hone ki wajah se wah swayam doosaro ko chot pahucha sakta hai.

- Sukra se udit prbhav rekha yadi bhagya rekha ki sahayak rekha bankar chale to jatak ki bhagyavridhi mein ristedaaro awam swayam ka pryaad sammalit rahta hai. (dekhey chitra sankhya-229)

- Sukra athawa mangal se udhit prabhav rekha bhagya rekha ko kaatkar chandra parvat se sanyog karein to jatak ke rojgaar mein viprit ling waalo ke hastchep ki wajah se durbhagyapurna sithti utpann ho sakti hai. (dekhein chitra sankya-230)

- Shukra se udit sabal prabhav rekha budh pravat pr pahuche to jatak ke vyaparik athava gyan vigyan sambhandhi labho mein isthmitro awam ristedaaro ka sahyog rahta hai. (dekhein chitra sankhya - 231)

- Prabhv rekha ke hridhya rekha dwara bhadhit hone pr kisi ristedaar, bhai bandhu ke vishaswasghat ke karan hridhya rog ho ya man vythit hota hai. Yadi yah rekha badhit na ho to tatha hridya rekha ko kaatkar bahar aa jaay to jatak ke prem sambandho athava bhavnatmak lagaav mein uske sambhandhi badhak bante hai. (dekhein chitra sankhya-232)

- Mastak rekha awam hridya rekha ko kaatkar budh parvat pr pahuchane wali prabhav rekha talaak ki sambhavna bada deti hai. Sath hi wah anuraag rekha ko bhi kaat de to algaav avashya hi hota hai. Divibhajit prbhav rekha hridya rekha dawara bhadhit hone pr bhi pati-patni mein algav paida krti hai. (dekhein chitra sankhya-233)

- Anurag rekha ko kaatne wali prbhav rekha yadi dwepyukt ho to kisi pshadyantra ke phalsawaroop vivhahit jeevan mein algav hot hai. (dekhein chitra sankhya-234)

Lekh aagey jaari rahega aur chitra kal diye jaayengey......

Why daily palmistry?

              Have you ever been frustrated with the mystery of the future? Wishing, for example, that you could simply know which lover would end up being the one with whom you could settle down and spend the rest of your life? After a particularly hard day that makes you wish you had never gotten out of bed, don't you wish you had seen a sign, be-fore leaving your house, urging you not to proceed? Have you wished for clarity about whether it was the right time to sign on a house, get married, have kids, or make any huge, life-changing decision? Look no further than those wiggly appendages on the ends of your arms.

 Palmistry, also called chiromancy, includes the study of not only lines on the palms of your hands, but also fleshy muscles and fat on the palms, bone structure and shape of the hand, flexibility, visible veins, skin, nails, and even hairs on both the fronts and backs of hands and wrists. Anyone can use palmistry, for themselves and others, in order to con-firm the owner of the hands' personality characteristics and discover the potential of a person's future. Having a system like palmistry to discover spiritual truths is called divination, although palmistry skirts the definition between being a divi-nation system and a collection of omens. Omens are signs seen in nature that predict events, while divination includes man made tools for fortune-telling like tarot cards and runes.

Why would you want to know your destiny? Don't worry, you still have a lot of control within the framework of your life's path. Think of it like a road map full of one-way streets. Sure, you have to stay on the roads, so your travel through your fate is somewhat limited, but every intersection allows you a choice that will alter your course, perhaps forever. If you can see the forks in the road ahead of time and where they most likely will lead (depending on other future choices, of course), you can decide whether to turn the other way, hit the brakes, or punch the gas.

As many people know, divination is the practice of fortune-telling using tools or a system, and there are several benefits to palmistry over other methods of divination. For one thing, people have been observing changes in their hands as their destiny changed since humans first noticed they had hands. As a result, there are systems of palmistry in many cultures, including the Western, Chinese, and Indian systems that are popular today. Another benefit of the study of palmistry over the course of human history is that nearly every problem that can befall the human condition has been intricately documented. Whatever need you may have, from love to money to obscure medical conditions, you can bet that somebody else had the same problem in the past and solved it with palmistry's help.

The biggest advantage of palmistry is that it is immediately available to you at any time, since your hands are always right there in front of you. Unlike other forms of divination that may require you to haul around a heavy bag of rocks with runes on them, a deck of tarot cards, or a (somewhat fragile) crystal ball, your hands are washable, wearable, and always available. As a bonus, most other people you meet will have some hands of their own to study. []

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Astrology & You

Astrology is the science of the heavens in relation to its effects on human beings. We know, the earth is very small as compared with the Sun and goes round it completing one orbit in 365 days, 6 hours, 9 minutes and 9.7 seconds. As compared with trillions of stars, the earth is a mere speck. Many of the fixed stars are so distant from earth that it takes thousands of years for light to travel from them to us. And light travels at the rate of 1,86,000 miles per second. So the magnitude of the heavens can better be imagined than described.

Many people contest the theory that the stars and the planets can affect human beings on earth. But the practical experience of thousands of years has confirmed that the Sun, Moon etc. not only emit heat, light, magnetism, electricity and other energies known to science but other subtler forces which profoundly influence life on earth. We are aware, how, the heat of the Sun not only creates weather conditions, ripening of crops and other natural phenomena. We are also aware how changes in sun-spots affect radiowaves passing through the earth's atmosphere. Many scientists have established a correlation between the cycle of the sun-spots and periods of economic depression on our planet. The effect of the Moon on the seas causes high and low tides is too familiar a phenomenon to be elaborated. Many diseases such as asthma and epilepsy have a direct connection with the digits of the Moon. The word lunacy comes from luna which means 'the moon' and persons born at a time when the Moon is weak and severely afflicted in the heavens, suffer from derangement of the mind or lunacy. The menstrual cycle in women is distinctly the lunar cycle of twenty-eight days.

Not only Hindus, but practically all the old civilisations on earth believed in the science of astrology.

Says Sidney K. Bennett, "Astrology's scientists and students are numbered by hundreds among the world's greatest of all time. Students of this science are in very good company, for they are standing side by side with Moses, Newton, Emerson, Kepler, Harems, Plato, Ptolemy, Zoroaster, Abraham, Thales, Anacimander, Hippocrates, Bacon, Napier, Flamstead, Cardan, Placidus, Brahe, Shakespeare, Byron, Scott, Dryden, Chaucer, Goethe, Copernicus, Galileo, Regiomontanus, Paracelsus and countless other guardians of wisdom in all ages and in all lands."

The annals of history are replete with references to the science of astrology and how predictions made on the basis of stars have been fulfilled. With Hindus, astrology is a part of the religion itself. The Vedas, the Puranas and the epics are all full of astrological lore and perhaps in no country of the world, astrological traditions are so ancient and widespread as among the Hindus. A birth-chart is made when a child is born and religious propitiations made for unfavourable influences, if any. The earliest and the most religious texts of the Hindus refer to astrology and the faith of an average Hindu in this divine science is strong and unflinching.

The subject, like every other branch of learning is, however, so vast that it is a problem to compress it within a small book. Still an attempt is made here to provide enough guidelines to comprehend the principles of Hindu astrology.

 Before dealing with the principles of astrology, we would like to acquaint the beginners with some of the preliminaries, for once they are familiar with the basic background, they would fmd it easier to follow the subsequent steps.


The earth goes round the Sun but it appears that the Sun goes round the earth. So whether we say the path of the earth or the apparent path of the Sun, it means the same thing. This path is called the ecliptic. The earth's path is strictly on the ecliptic line. The other planets—Mars, Mercury, Jupiter etc. go round the Sun along the ecliptic line, but sometimes they are exactly on this line at others slightly north or south of the ecliptic. This passage is called the zodiac. The Oxford Dictionary defines zodiac as "a belt of the heavens limited by lines about 8 degrees from the ecliptic on each side, including all apparent positions of the Sun and planets as known to the ancients and divided into twelve equal parts called signs of the zodiac."


This zodiac is not exactly circular but elliptic. Since a circle or an ellipse has, as computed from the center, 360 degrees, each of the twelve pans or sectors constitutes 30 degrees. These twelve sub-divisions arc called signs. Why are they called signs? A sign means' mark traced on surface etc.' and in each of these sub-divisions there are different patterns formed by the fixed stars, so there are different types of marks constituted by the stars or groups of stars and each sub-division is identified by the special pattern formed therein by the fixed stars. These fixed stars or groups of fixed stars are called asterisks or constellations in English and nakshatra in Sanskrit. This word nakshatra will recur again and again in this book and so the readers would be well-advised to acquaint themselves with this word.

To revert to signs, since the zodiac is divided into twelve pans of 30 degrees each, there are twelve signs named as follows:
I. Mrs 2. Taurus 3. Gemini 4 Cancer
S. Leo 6. Virgo 7. Libra 8. Scorpio
9. Sagittarius 10. Capricorn 11 Aquarius 12 Pisces.

Tropical and Sidereal Zodiac

 There is only one Sun, one earth and one zodiac. Why are there then two names for the zodiac? This is being explained. If we were to measure a straight line, every one would commence from one end and finish at the other. But when the figure is circular or elliptic, the question arises from where to begin, on the circumference. The Western astronomers commence from that point on the zodiac where the Sun appears to be on or about 21• March—at the spring equinox—when the day and the night are equal. Then, from there they mark sectors of 30 degrees each and call them Aries, Taurus etc. This is called computing in the tropical zodiac.

But this point—the spring equinoctial point—is not fixed or constant. In about 72 years it recedes by about one degree, with the result that if the tropical zodiac commenced at a point, say X in the year 1900, it commenced at a point one degree prior to point X in the year 1972. Thus, this point not being a fixed one, the Hindus rejected it for astrological and predictive purposes and followed the system of commencing the measurement on the zodiac from a fixed star or constellation called Ashwini in Sanskrit. The fixed stars or constellations have also some slight motion in thousands of year but that motion being infinitesimal, is for all practical purposes considered negligible. So the Hindus compute the twelve signs from Ashwini (a fixed constellation) and divide the zodiac into twelve parts of 30 degrees each and call them Aries, Taurus, Gemini Cancer etc. Since this computing is from a fixed point, it is called the fixed zodiac or the sidereal zodiac. The word sidereal is derived from the Latin word sidereus which means pertaining to the constellations (fixed stars).

Since the 0° or the commencing point in the tropical zodiac is ever gradually preceding, the distance between the commencing points on the two zodiacs (the tropical and the sidereal) has accumulated to 23 degrees 29 minutes 4 seconds of the arc on I" January, 1973. This phenomenon of the precession of the equinoctical point is called precession of the equinoxes. Thus, the readers will observe that the zodiac is one and one only but due to the variation in the commencing points, it is referred to differendy as the tropical zodiac and the sidereal zodiac.

Longitudes of Planets 

The Hindu astrology is sidereal. All references hereafter are to the sidereal zodiac only. The position of a planet from 0 degree to 360th degree—anywhere on the zodiac is called the longitude.

One degree is divided into 60 minutes. One minute is further subdivided into 60 seconds.  When we want to be very exact. We refer not only to the degree but to minutes and seconds also. The symbols for degree. minutes and seconds are as follows: 23 degrees, 29 minutes, 4 seconds - 23°-29-4".

We have explained earlier that each sign extends to 30°. The domain of each of the signs, is therefore, as follows:

1. Arica O' to 30' 7. Lido 180' to 210^ 2. Taunts 30* to 60' 210° to 240' 8 Scorpio 9. Sapaturtus 3. Gemini 60e to 90' 240" to 270' 4. Cancer 90' to 120' 10. Capricorn 270° to 300' 5. Leo 120"io 150' 11. Aquarius 300' to 330' 6. Virgo 150' to 180' 12. Pisces 330' to 360e

The Sanskrit names for the twelve signs are as follows:
1. Mesa 2. Vrisbha 3 Mithuna 4. Karka 5.  Sinha  6. Kanya 7. Tula 8. Vrishchika
9.  Dhanu  10. Makar 11.  Kumbha  12.  Meen

The readers will do well to memories these names of the twelve signs. There will be references to these names again and again in this text-book. Now, please note one more point in this connection. Suppose a planet is in the 36th degree of the zodiac. You may refer to it as being in the 36th degree or as occupying the 6th degree of Taurus, because the sign Aries finishes at 30° and the 36th degree would be 6th degree in Taunts. Or take another example. Suppose a planet's longitude is 242°-15.. Now looking to the above table you know that Scorpio finishes at 240°—so the planet's longitude will be 2°-15' in the next sign i.e., Sagittarius. Since S signs have been completed, we refer to the planet's longitude as 8-2°-15'. Here 8 stands for the completed sign—Scorpio, which is the 8th sign in the zodiac. So there are two methods prevalent in referring to the longitude of a planet. Either you say 242°-15' or you refer to it as 8-2°-15'—it means the same thing. We shall in this book follow the second method, because it obviates the necessity of dividing the number of degrees by 30 and determining the sign position.


The Hindu astrology takes cognizance of only nine planets:
(1)Sun, (2) Moon, (3) Mars, (4) Mercury, (5)Jupiter, (6) Venus, (7) Saturn, (8) Rahu and (9) Ketu. 

It does not deal with Uranus (also called Herschel), Neptune and Pluto. 

The Sanskrit names for the planets are as follows: 

1. Ravi or Surya 2. Sukhra 3. Chandra 4. Shani 5. Mangal or Kuja 6. Rahu 7. Budha  8. Ketu 9. Guru or Bribaspati 

Strictly speaking, the Sun and the Moon are luminaries. Mars, Mercury, Jupiter, Venus and Saturn are planets. Rahu and Ketu are the northern and the southern nodes of the Moon. Where the Moon in its orbit round the earth cuts the ecliptic and goes to the north of it, the point is called the northern node of the Moon and the corresponding position, where the Moon cuts the ecliptic and goes south of it, is called the southern node of the Moon. These two positions on the ecliptic are always 180° apart. These positions are, however, not fixed but are receding month to month so that in a period of about 19 years they complete one cycle of the zodiac. Since these points recede they always have a backward motion. These points besides being referred to as the nodes of the Moon are in English referred to as Caput Draconis and Cauda Draconis. We shall, however, refer to them as Rahu and Ketu in this text-book. These are merely sensitive points but have a powerful influence on the human beings. The Hindu scholars, therefore, have included them in astrological calculations. As explained above these are not planets but for convenience, the Sun, the Moon, Mars Saturn, Rahu and Ketu are all referred to as planets. In Sanskrit all the nine are called grahas. The word literally means that which holds or attracts and thereby exerts influence.

Source: Astrology and you

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Thursday, July 7, 2016

Hand Image Of Dirty Girl - Palmistry

Marriage Line is also called Line of Affection.  Marriage line does not necessarily show marriage it may only indicate attachment to someone male or female.  In other words this line can indicate anyone whom you consider a friend or loved one.  Marriage line is often found on porn star, prostitutes, unmarried person, celibates, saints (sadhu), and kinnar, bisexual, hinjda, eunuchs, and in such cases indicates strong friendship.  So every marriage line does not necessarily represent marriage but it does represent an affection that you have felt or feel for someone. {Dirty School Girls}

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Sunday, July 3, 2016

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Friday, July 1, 2016

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